कल आपने राष्ट्रभाषा पर फ़िराक़ गोरखपुरी साहब की लम्बी कविता 'बन्दे मातरम' के दो टुकड़े पढ़े थे। एक और हिस्सा देखिए:
अब जिगर थाम के बैठो मेरी बारी आई
क्या हम को समझ रखा है तुमने हम कांग्रेसिये लीडर हैं
हो भैंस चराने की न लियाक़त, पार्लिमेंट के मेम्बर हैं
हम नरक बना दें भारत को, यानी हम लोग मिनिस्टर हैं
मालिक हैं सफ़ेद-ओ-सियाह के हम, हम हिन्दुस्तां के मुकद्दर हैं
भारत की दुखती छाती पर भारी से भारी पत्थर हैं
- बन्दे मातरम
हम गांधियत के नख़रे, गांधियत के नाज़-ए-बेज़ा हैं
जनता को पयामे-ए-मर्ग हैं हम, भारत के गले का फ़न्दा हैं
हम हिन्द की मिटी उमीदें हैं, जम्हूर का ख़ून-ए-तमन्ना हैं
हैं सत्य अहिंसा की मूरत क्या तुमको बताएं हम क्या हैं
सब लोग हमारी जय बोलें, हम राजा हैं, हम परजा हैं
-बन्दे मातरम
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Thursday, 28 February 2008
Wednesday, 27 February 2008
बन्दे मातरम : भाग एक
फ़िराक़ साहब ने किसी ज़माने में भारत की सांस्कृतिक और राजनैतिक दरिद्रता, खोखली देशभक्ति और भाषाप्रेम के साथ साथ अफ़सरशाही पर तंज़ कसते हुए एक लम्बी कविता लिखी थी 'बन्दे मातरम'। सस्ते शेरों की महफ़िल में क्यूं न उसके कुछ हिस्से पेश किए जाएं। यह रही पहली किस्त:
राष्ट्र भाषा
सब जुमले टेढ़े मेढ़े हैं अलफ़ाज़ भी हैं रोड़े पत्थर
और इस पर तुर्रा यह है कि हम मीर-ओ-ग़ालिब से हैं बढ़कर
हम नाक काट लें 'सादी' की हम शेक्सपीयर के हैं हमसर
यह अहले-अदब ये अहले-क़लम किस बोली के हैं छूमन्तर
ये क़ौमी ज़बां के मोजिद हैं साहित्यरत्न, विद्यासागर
-बन्दे मातरम
सुनने वालों के होश उड़ें वह पढ़ के मारते अन्छर हैं
जो मुंह में आए बोल जाएं, शब्दों के यहां दलिद्दर हैं
इस ऊबड़ खाबड़ बोली में, वो झक्कड़ और बवंडर हैं
मतलब ही जड़ से उखड़ जाए वो चलते हुए चलित्तर हैं
हम 'हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान' लिख लोढ़ा हैं पढ़ पत्थर हैं
-बन्दे मातरम
राष्ट्र भाषा
सब जुमले टेढ़े मेढ़े हैं अलफ़ाज़ भी हैं रोड़े पत्थर
और इस पर तुर्रा यह है कि हम मीर-ओ-ग़ालिब से हैं बढ़कर
हम नाक काट लें 'सादी' की हम शेक्सपीयर के हैं हमसर
यह अहले-अदब ये अहले-क़लम किस बोली के हैं छूमन्तर
ये क़ौमी ज़बां के मोजिद हैं साहित्यरत्न, विद्यासागर
-बन्दे मातरम
सुनने वालों के होश उड़ें वह पढ़ के मारते अन्छर हैं
जो मुंह में आए बोल जाएं, शब्दों के यहां दलिद्दर हैं
इस ऊबड़ खाबड़ बोली में, वो झक्कड़ और बवंडर हैं
मतलब ही जड़ से उखड़ जाए वो चलते हुए चलित्तर हैं
हम 'हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान' लिख लोढ़ा हैं पढ़ पत्थर हैं
-बन्दे मातरम
Saturday, 23 February 2008
वल्लाह निकालते हैं यों दिल की भड़ास उर्फ़ राजरिशी की आमद
'फ़िराक़' गोरखपुरी की लम्बी नज़्म 'माज़ी परस्त' से तीन टुकड़े:
कलचर की अहमियत को समझाते हैं
क्या फूल हिमाक़त के वो बरसाते हैं
दरशन हुए जाते हैं अभी भक्तों को
सोटा लिए वो राजरिशी आते हैं
झटकाते हैं कांधे अड़बड़ा जाते हैं
ऐसे मौकों पै हड़बड़ा जाते हैं
सुलझाने को कहिए कोई उलझी हुई बात
तो राजरिशी जी गड़बड़ा जाते हैं
वल्लाह निकालते हैं यों दिल की भड़ास
सब राजरिशी से बांधे बैठे थे आस
भूखों प्यासों को आज वक़्ते-तक़रीर
वो डांट पिलाई न रही न रही भूख न प्यास
(माज़ी परस्त: अतीत का पुजारी, राजरिशी: राजर्षि, वक़्ते-तक़रीर: भाषण के समय)
कलचर की अहमियत को समझाते हैं
क्या फूल हिमाक़त के वो बरसाते हैं
दरशन हुए जाते हैं अभी भक्तों को
सोटा लिए वो राजरिशी आते हैं
झटकाते हैं कांधे अड़बड़ा जाते हैं
ऐसे मौकों पै हड़बड़ा जाते हैं
सुलझाने को कहिए कोई उलझी हुई बात
तो राजरिशी जी गड़बड़ा जाते हैं
वल्लाह निकालते हैं यों दिल की भड़ास
सब राजरिशी से बांधे बैठे थे आस
भूखों प्यासों को आज वक़्ते-तक़रीर
वो डांट पिलाई न रही न रही भूख न प्यास
(माज़ी परस्त: अतीत का पुजारी, राजरिशी: राजर्षि, वक़्ते-तक़रीर: भाषण के समय)
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