Thursday, 14 February 2008

Pay Commission -6( छठा वेतन आयोग)


हर करमचारी जो है सरकारी ,फिरता ज्यों कोई खजियल कुत्ता
लार गिराता बस यही मनावे के
बढ़ जाए मेरा भत्ता !!

Wednesday, 13 February 2008

पिया पिया पिया न पिया

पिछले दिनों सस्ता शेर के दो नये शायरों भाई विजयशंकर और भाई पंकज सुबीर ने क़ाबिले तारीफ़ बल्लेबाज़ी करके मुझे क़ायल कर दिया। मैं उन दिनों बहुत रेगुलर नहीं था और उनके लिखे पर वक़्त से दाद न भेज सका.
पेश हैं ये चंद लाइनें हमारे इन्हीं दो रणबाँकुरों के लिये-

मरीज़े इश्क़ का क्या है जिया जिया जिया न जिया
बस एक साँस का मसला है लिया लिया लिया न लिया
हमारे नाम से आया है जाम महफ़िल में
ये और बात है हमने पिया पिया पिया पिया न पिया.

Friday, 8 February 2008

पता उनको नहीं कुछ आठ बच्‍चों की मदर होकर

प्रसिद्ध हास्‍य कवि स्‍व काका हाथरसी की ये ग़ज़ल सुनें वैसे तो इसमें भी बच्‍चे हैं पर वे मेहबूबा के न होकर अपनी ही सगी वाली पत्‍नी के हैं

हमीं से पूछती हैं भाव चीनी और चावल के

पता उनको नहीं कुछ आठ बच्‍चों की मदर होकर

घटापा चल रहा अपना, मुटापा बढ़ रहा उनका

कुचल देंगें मेरी सैकिल, किसी दिन ट्रेक्‍टर होकर

Thursday, 7 February 2008

हमें जिससे मुहब्‍बत थी उसे अब चार बच्‍चे हैं

मुहब्‍बत भी बड़ी अजीब चीज़ होती है लोग कहते हैं कि मैं उससे मुहब्‍बत करता था पर कह नहीं पाया यो शर्म में ही रह गया । मगर उम्र शर्म थोड़े ही देखती है आपकी शर्म ही शर्म में उसके बच्‍चे आकर आपको मामा भी कह जाते हैं ।  वरिष्‍ठ कवि आदरणीय प्रदीप जी चौबे की ये ग़ज़ल तो ये ही कहती है

ग़रीबों का बहुत कम हो गया है वेट क्‍या कीजे

अमीरों का निकलता आ रहा है पेट क्‍या कीजे

हमें जिससे मुहब्‍बत थी उसे अब चार बच्‍चे हैं

तकल्‍लुफ़ में बिरादर हो गए हम लेट क्‍या कीजे

Tuesday, 5 February 2008

गालिब उठो सलाम करो सेठ आ गया

चचा गालिब नए रोल में-

गालिब उठो सलाम करो सेठ आ गया,
वो दिन गए कि कहते थे नौकर नहीं हूँ मैं.

हिनहिनाए जो घोड़े ग़ज़ल हो गई - क्‍या अपने अल्‍हड़ बीकानेरी जी की ये ग़ज़ल सुनी है, नहीं तो पूरी यहां देखें

अब जब सभी लोग दूसरों की ही पेल रहे हैं तो मैं क्‍यों पीछे रहूं । पर आज जो गज़ल़ मैं दे रहा हूं ये जनाब अल्‍हड़ बीकानेरी जी की एक मज़ेदार ग़ज़ल है जिसका हर शेर आनंद देता है ।

लफ़्ज़ तोड़े मरोड़े ग़ज़ल हो गई

सर रदीफ़ों के फोड़े ग़ज़ल हो गई

लीद करके अदीबों की महफि़ल में कल

हिनहिनाए जो घोड़े ग़ज़ल हो गई

ले के माइक गधा इक लगा रेंकने

हाथ पब्लिक ने जोड़े गज़ल हो गई

पंख चींटी के निकले बनी शाइरा

आन लिपटे मकोड़े ग़ज़ल हो गई  

Monday, 4 February 2008

तेरे भाई वो नाटे और काले याद आते हैं

अपने शेर पेलने का एक अलग ही आंनद होता है और उस आनंद की ही खातिर हमने सस्‍ता शेर ज्‍वाइन ( अवैतनिक) करने के बाद से कोई भी शेर किसी दूसरे का नहीं पेला । अपने ही माल से काम चला रहे हैं बल्कि रोज ही खुद ही लिख रहे हैं । और लिख लिख कर ही पेल रहे हैं ।

चलिये एक और याद का शेर प्रस्‍तुत है

तेरे   भाई   वो नाटे   और   काले   याद   आते हैं

जो होते होते रे गय वो ही 'साले' याद आते हैं

ग़ज़ब मारा था उस जालिम ने यूं के आज तक हमको 

वो दिन जो हस्‍पतालों में निकाले याद आते हैं

१८ वां बैनुलअक़्वामी किताब मेला पूरे शबाब पर !!


मनीषा ,अशोक, इरफान ,जनचेतना के सचेतक और रोहित उमराव

मैं और मेरा मफलर !!

ढाई आखर के प्रणेता नासिरुद्दीन के साथ !

कुतुब्फरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है :सत्यम वर्मा(जनचेतना)

कौतूहल के पल !! --खरीद लूं या नहीं? सोच में इरफान

हालांकि सही शब्द-चयन के हिमायती इरफान के मुताबिक मेला ' उरूज' पर होना चाहिऐ मगर नाचीज़ की राय में ये जिस पर भी हो ,रहेगा वहीं जहाँ कि वो 'है' यानी दिल्ली के प्रगति मैदान में !लेखकों और कवियों के साथ साथ दुनिया भर के कुतुब्फरोश , किताबी कीड़े , पुस्तकालयों के कमीशन एजेंट और बुक फेयर में 'affair' की गुंजाइश ताड़ने वाले छंटे हुए लोग इस १८ वें विश्व पुस्तक मेले में इन दिनों दिल्ली आये हुए हैं सो हम भी पहली फुरसत में वहाँ पहुंच गए और पहुंच कर क्या देखते हैं कि ब्लौग - बिरादरी की कई धुरंधर , नामचीन हस्तियाँ मौकाये-वारदात पे पहले ही मौजूद हैं जिनमें मोहल्ले के दादा अविनाश हैं , वेब दुनिया की सहाफी मनीषा पाण्डेय हैं , ढाई आखर के नासिरुद्दीन हैं , इरफान भी हैं और साथ में हैं रोहित उमराव और कबाड़खाना फेम अशोक पांडे !! संवाद और जनचेतना प्रकाशन ने अशोक की कई नयी-पुरानी किताबें सजाई हैं जिनमें विश्व प्रसिद्ध कथा साहित्य एवं कविताओं के अनुवाद पाठकों के बीच चर्चा का मौजूं बने हैं । अशोक के कुछ युवा fans की बेक़रारी बडे- बडों में जलन पैदा करने को काफी है ! इससे पहले की प्रगति मैदान में कोई अग्नि काण्ड हो
वहाँ से निकल लेने में भलाई समझी जाती है और खास लोगों का काफिला 'इन्नोवा' में सवार हो जा पहुँचता है दक्षिण दिल्ली के एक गेस्ट हाऊस जहाँ रानी खेत क्लब की कुछ यादें फिर ताज़ा होती हैं , सस्ता शेर की निंदा करने वाले अल्पज्ञ ब्लोगरों की बुद्धि पर तरस खाया जाता है ......जहाँ तक बात पीने की है तो chivas रीगल और वाट 69 दोनो हैं मगर चूंकि सोनापानी ट्रिप की शिवास अभी उतरी नहीं है सो वाट 69 की डाट खोली जाती है और एक पैग लेने के कुछ ही क्षण बाद मन ही मन मैं कह उठता हूँ --
न पूछ ऐ दोस्त कि क्या है मेरा sun- sign / होश ले गयी मेरा ये वाट
सिक्स्टी नाइन !! आमीन !!
साग़र खैय्यामी साहब फ़रमाते हैं-

मंजन घिसा था जिनपे चमकने की आस में

रक्खे हुए हैं दांत वही अब गिलास में.

Sunday, 3 February 2008

इस बार चाचा गालिब की ज़मीन पर अपना कुतुबमीनार-

बेलन है उनके हाथ में औ खटिया के नीचे मैं,

गालिब मुझे बताएं कि भागूं किधर को मैं?


-विजय सतनवी

Saturday, 2 February 2008

दिल की चूल हिली देखी तो

दिल की चूल हिली देखी तो हमने तेरा नाम लिया
दफ़न कबर में करने की भी उन ने रस्म बनाई क्या

(मरहूम दोस्त और अजीमुश्शान शायर हरजीत से माफ़ी सहित)

आदमी


बचपन में वो उडाता है कन्कव्वे और जवानी में यारों फाख्ता /
फिर बुढापे में धूप सेंकता है के जैसे कोई कबूतर सज़ायाफ्ता !!
पेश-ए-खिदमत है एक भुक्तभोगी शेर-

राधा की सौत गर थी किसना की बांसुरी,
बीवी की मेरी सौतन मेरा ब्लॉग है।

- विजय सतनवी
(मज़ाक नहीं कर रहा हूँ, इस शेर को ब्लॉगबली अपने-अपने ब्लॉग का स्लोगन बना लें).

ठंड की वजह से जाड़ा हुआ

ठंड की वजह से जाड़ा हुआ
जो सीधा खड़ा था वो आड़ा हुआ
इफ़्फ़न 'घुर्मामारकुण्डवी' को देखो
पजामा बने था, सो नाड़ा हुआ

एक पुराना ट्रक वाला शेर

यह बहुत मशहूर शेर है, लेकिन पता नहीं यहां आने से कैसे रह गया। माल पुराना है, लेकिन सबसे सस्ते शेरों की तरह हमेशा मौजूं:

मालिक की ज़िन्दगी अंडे और केक पर
ड्राइवर की ज़िन्दगी स्टेरिंग और ब्रेक पर

Friday, 1 February 2008

एक बार फिर .........(सिग्नेचर शेर )



कमबखत एक खाज है ये शाइरी जिसको हमें खुजाना है / इसके-- उसके ब्लौग पे तकना ये तो फ़क़त बहाना है !!

इस मर्तबा पेश-ए-खिदमत है एक क्लासिक शेर-

उचक रहा है चिड़ीमार, बांस छोटा है
ये साजिशें हैं फ़कत मेरे आशियाँ के लिए।


(ये शेर मरहूम बाक़माल अदाकार बलराज साहनी साहब ने अपनी आत्मकथा में इस्तेमाल फ़रमाया है. हमने यहाँ इस्तेमाल फ़रमाया. कोई उज्र?)

'सस्ता शेर' पर एक अखबार में लगी न्यूज़: मुनीश के हवाले से

दस बन्दों को ड्रिप चढ़ी, तीन जने हलाक़ हुए
"शायरिंग ऐसी हुई" - एक रिसाला लिखता है

Thursday, 31 January 2008

ओये कुर्बान !! ओये लाले दी जान!!



ऐसा तो ब्लौग यारों ना मिलेगा कहीं ढूंढें से भी जहन्नुम में
बडे बडे उस्ताद जहाँ करते हैं शायरी चूतिया सी तरन्नुम में!!

देश के भोंदू वीरों के लिए क़सीदा

नाटक देखा, डांट भी खाई, थोड़ा हुए अधीर,
बीवी घर से भाग गई, धनुष मिला ना तीर

एक रुपे का कद्दू खाया, तीन रुपे की खीर
खीस निपोरी, सड़क पे थूका, ऐसे भोंदू वीर

आया मौसम सर्दी का

जब तक समझते मतलब मौसम बदल गया,
इतनी पड़ी है ठंड कि सुई-धागा निकल गया..

मुर्मू मांझी के बाद अब इफ़्फ़न 'घुर्मामारकुण्डवी'

यार उरियां हो गए, जो उरियां किया बिलाग पे
फ़ोन का इक बिल अज़ीज़ो, इफ़्फ़न 'घुर्मामारकुण्डवी' ने

(यह एतिहासिक सेर और इफ़्फ़न 'घुर्मामारकुण्डवी' नामक सायर उस पोस्ट के बाद अस्तित्व में आए जिसे टूटी में कुछ रोज़ पहले लगाया गया था.)

कुछ भेंगे से शेर अर्ज़ करना चाहता हूं

आपने मेरी खड़ी खड़ाई ग़ज़ल को पसंद किया उसके लिये पार्टी आपका शुक्रिया अदा करती है और विश्‍वास दिलाती है रवि रतलामी जी को कि सभी प्रकार की वे ग़ज़लें उनको सुनने को मिलेंगीं जो वे चाहते हैं

shahrukh42 copy

अर्ज़ किया है

बाप को उनके बनाते मूर्ख हम चुपचाप से

और माशूका के भाई के भी बचते ताप से

या ख़ुदा तूने हमें भेंगा बनाया क्‍यों नहीं

देखते महबूब को और बात करते बाप से

प्यार गया पैसा गया और गया व्यापार
दर्शन दुर्लभ हो गए जब से दिया उधार.

(मोहल्ले के एक नाई काका की दूकान के सौजन्य से).

हां पेट में दाना नहीं

हां पेट में दाना नहीं, बोतल में तो रम है
कहने दे मुझे सारा फ़साना यहां आ के

Wednesday, 30 January 2008

खाने को न दे तो फर्क भी क्‍या पड़ता है

अशोक जी ने लिखा है कि नशा दाने दाने को मोहताज कर देता है ये उन्‍होंने एक ट्रक पर से पढ़ा है । अब ये तो उन्‍होंने नहीं बताया कि वे ट्रक के पीछे क्‍या कर रहेथे । खैर मैं जवाब दे रहा हूं और हां एक बात पहले ही बात देता हूं कि भले ही सस्‍ता शेर पर वैधानिक चेतावनी लगी है कि शेर जरूरी नहीं हैं कि लिखने वाले के ही हों पर मैं तो अपने और केवल अपने ही ताज़ा लिखें पेश कर रहा हूं सो चुराने की कोशिश करने पर कापीराइट लग जाएगा ( वैसे हिन्‍दुस्‍तान में कापीराइट चलता ही कितना है )

न दे गर कोई खाने को नहीं दाना भी दे कोई

मगर पीने को तो देगा भला मानुस अगर होगा

एक ट्रक से मिली नसीहत

नशा नाश कर देगा, फिरोगे दाने - दाने को
कटोरा हाथ में होगा, न देगा कोई खाने को

देशप्रेम की कविता




आँखों में पलते ख्वाबों की ताबीर नही देनेवाले,
जन्नत का गुमां हो जिसपर वो जागीर नही देनेवाले,
तुम सुलह करो या जंग करो मर्ज़ी तुम्हारी जो भी करो,
हम जान तो दे सकते हैं, मगर कश्मीर नही देनेवाले...

Tuesday, 29 January 2008

जलाल्बाई !!


अब क्या कीजे बयां उस ज़ालिमा का जलाल /
बस तस्वीर में देखी है , जी को सालता है ये मलाल !!

एक खड़ी हुई ग़ज़ल के कुछ शेर बैठ कर सुनें

आपने कभी खड़ी हुई ग़ज़ल देखी है । यक़ीनन नहीं देखी होगी हुई ही नहीं तो आप देखेंगें कहां से दरअस्‍ल में तो गज़ल या तो बैठी हुई होती है ( मयखाने में ) या फिर लेटी हुई होती है ( उनकी ज़ुल्‍फों की घनेरी छांव में ) । ये पहला प्रयोग किया जा रहा है कि ग़ज़ल को खड़ा किया जा रहा है अपने पांवों पर । ग़ज़ल को खड़ा करने के पीछे शायर का क्‍या मकसद है ये तो उसको खुद को भी नहीं पता पर फिर भी लिखी है तो सुन लो ।

इधर हम खड़े थे, उधर वो खड़े थे

उधर वो खड़े, हम इधर को खड़े थे

खड़े थे इधर हम, खड़े थे उधर वो

खड़े वो उधर, हम इधर जो खड़े थे

न पूछो ये हमसे खड़े थे किधर हम

खड़े तुम उधर, हम इधर तो खड़े थे

बड़ी राह देखी तुम्‍हारी यहां पर

उधर तुम थे और हम इधर लो खड़े थे

भले तख्‍ती कर लो बहर में मिलेगा

के दोनों मिलाकर के दुइ ठो खड़े थे

चलो सुन लो मकता ख़तम खेल हो ये

वहां कुल मिलाकर के हम दो खड़े थे

Monday, 28 January 2008


मूरत को देखकर चुराने का भाव मन में जागता है
गुरु, इसीलिए तो भगवान भक्तों से दूर भागता है.

एक मासूम सी ग़लतफ़हमी

हमें हर वक्‍़त लगता था हमें वे देखती हेंगी

अगर यूं देखती हैं तो यक़ीनन दिल भी वो देंगी

मगर कमबख्‍़त कि़स्‍मत को कहां पर रोइये जाकर

ग़लतफ़हमी हमारी थी उधर तो आंख थी भेंगी

Sunday, 27 January 2008

शेयरों के भाव

सोचा था तेरे देश में मंहगे हैं शेर दोस्त
पर शे(य)रों का भाव यहाँ और भी ख़राब!

(दुष्यंत कुमार से क्षमायाचना सहित).

Saturday, 26 January 2008

यौमे जमहूरी ; २६ जनवरी पर.......

नेता लोग को 'पुदीन-हरा ', पब्लिक को हलवा पूरी ,
ऐ वतन तुझको मुबारक फिर से ये यौमे -जमहूरी !!

Thursday, 24 January 2008


दिलजलों कि महफिल में कुछ दिल्लगी भी जरूरी है,



अमा रम करती है बात सीधी, व्हिस्की तो जी हजूरी है!

Tuesday, 22 January 2008

मासूम सवाल

दिल्ली और गुडगाँव के दर्म्मयाँ क्यूं कोई नदी बहती नहीं / क्यूं याद आती है वो लड़की जो मोहल्ले में अब रहती नहीं !
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Saturday, 19 January 2008

दिल्ली की सर्दियाँ

उफ़ ये नीम नीम दिल्ली की सर्दियाँ , The image “http://www.chakpak.com/se_images/35919_125_125_true/hot-kareena-35919-125125.jpg” cannot be displayed, because it contains errors.
फैशन परेड में मुब्तिला हसीनों की वर्दियां ,

रम के भरे ये पैग और अण्डों की ज़र्दियाँ
यारों रहें सलामत ये दिलकशी के मंज़र ,ये मासूम आवारागार्दियाँ !!

दस-पाँच लडका एक संतोस, गदहा मरले कबहूँ न दोस

अगर आपका नाम संतोष है तो लीजिये आपके लिये एक संतोष की बात-
एक मुहावरा है-दस-पाँच लडका एक संतोस, गदहा मरले कबहूँ न दोस
कहानी इस प्रकार थी-
कुछ लडकों ने एक गदहा मारा. उसके बाद सभी एक पंडित के पास यह जानने के लिये गये कि गदहा मारने पर क्या दोष लगता है. पंडित ने इसे महापाप बताते हुए, उससे मुक्ति के लिये अनेक लंबे-चौडे विधान बताए. इस पर किसी ने कहा कि पंडितजी, आपका लडका संतोष भी इसमें शामिल था. इसके बाद पंडितजी ने निम्नलिखित व्यवस्था दी-
-दस-पाँच लडका एक संतोस, गदहा मरले कबहूँ न दोस
---------------------------------------
पृष्ठ 417, कहावत कोश, बिहार राष्ट्र भाषा परिषद

Friday, 18 January 2008

राजू श्रीवास्तव मस्त आदमी है!


मैंने जबसे राजू श्रीवास्तव को देखा है उन्हें मस्त आदमी पाया है। उनमें ख़ालिस देसी हास्य है जो हम अवधी और भोजपुरी ईथॉस वाले लोगों को बहुत अपील करता है. लीजिये एक बानगी-

Thursday, 17 January 2008


मालिक तूने गाड़ी बनाने वालों को

क्यों बना दिया


इन्होने गाड़ी चलाने वालों को


बेघर कर दिया

Tuesday, 15 January 2008

NACH BALLIYE!!


शरद ऋतू की मधुर सांझ है प्रिये आओ पाएं भंगडा /
ओये पेल्ले मैं मूड बना लां इक पेग्ग ला के तगड़ा !!
सदमा तो है मुझे भी , कि तुझसे जुदा हूं मैं
लेकिन ये सोचता हूं , अब भी गधा हूं मै

Monday, 14 January 2008

एक दोहा !!


सकल पदारथ है जग माहीं!

लऊके कुछ नहिं,चश्में चाहीं !!

Monk once more......

मानो ना मानो तुम कुछ भी कहो बिरादर / ब्रांड भतेरे हैं दारू के पर ओल्ड मंक है सबका फादर !!

Sunday, 13 January 2008

kaaliya ke sher!!

अध्धा तो है बगल में साकी ,बस जा लेआ कुछ नमकीन निवाला ,
तब तक मैं कह दूँ सबसे- '-बुरी नज़र वाले तेरा मुंह काला '!!!

Saturday, 12 January 2008

Jai Borchi Bhayya!!

चाहे चलें तेगतलवार या बजते हों खांडे,
मस्ती बनी रहे तुम्हारी भाई अशोक पांडे!

Wednesday, 9 January 2008

माल -ए -मुफ्त ,दिल -ए -बेरहम


सिरहाने मीर के न बातें करो लीगल और इल्लीगल की ,
के सूती है आज उसने एक अदद बोतल CHIVAS रीगल की !!

Tuesday, 8 January 2008

HIMALAYAN HANGOVER!!


रात में पहाड़ पर बहती रही शिवास रीगल की एक नदी ,
भुलाने को वो मंज़र चाहिए हमको एक सदी !!

Sunday, 6 January 2008

जन्नत के ख्वाब

सारी जवानी काट दी दुनिया की ऐश में /
जन्नत के ख्वाब देखे है बुड़्ढा पड़ा पड़ा //

Tuesday, 1 January 2008

MUBARAQBAAD

BANI RAHE YE SASTI MEHFIL, MAIKASH KAREN THHATH,
BHAIYON AUR LUGAIYON KO MUBARAQ-- YE DO HAZAAR AATH.