
हर करमचारी जो है सरकारी ,फिरता ज्यों कोई खजियल कुत्ता
लार गिराता बस यही मनावे के बढ़ जाए मेरा भत्ता !!
महंगाई के दौर में एक राहत की सांस
प्रसिद्ध हास्य कवि स्व काका हाथरसी की ये ग़ज़ल सुनें वैसे तो इसमें भी बच्चे हैं पर वे मेहबूबा के न होकर अपनी ही सगी वाली पत्नी के हैं
हमीं से पूछती हैं भाव चीनी और चावल के
पता उनको नहीं कुछ आठ बच्चों की मदर होकर
घटापा चल रहा अपना, मुटापा बढ़ रहा उनका
कुचल देंगें मेरी सैकिल, किसी दिन ट्रेक्टर होकर
मुहब्बत भी बड़ी अजीब चीज़ होती है लोग कहते हैं कि मैं उससे मुहब्बत करता था पर कह नहीं पाया यो शर्म में ही रह गया । मगर उम्र शर्म थोड़े ही देखती है आपकी शर्म ही शर्म में उसके बच्चे आकर आपको मामा भी कह जाते हैं । वरिष्ठ कवि आदरणीय प्रदीप जी चौबे की ये ग़ज़ल तो ये ही कहती है
ग़रीबों का बहुत कम हो गया है वेट क्या कीजे
अमीरों का निकलता आ रहा है पेट क्या कीजे
हमें जिससे मुहब्बत थी उसे अब चार बच्चे हैं
तकल्लुफ़ में बिरादर हो गए हम लेट क्या कीजे
अब जब सभी लोग दूसरों की ही पेल रहे हैं तो मैं क्यों पीछे रहूं । पर आज जो गज़ल़ मैं दे रहा हूं ये जनाब अल्हड़ बीकानेरी जी की एक मज़ेदार ग़ज़ल है जिसका हर शेर आनंद देता है ।
लफ़्ज़ तोड़े मरोड़े ग़ज़ल हो गई
सर रदीफ़ों के फोड़े ग़ज़ल हो गई
लीद करके अदीबों की महफि़ल में कल
हिनहिनाए जो घोड़े ग़ज़ल हो गई
ले के माइक गधा इक लगा रेंकने
हाथ पब्लिक ने जोड़े गज़ल हो गई
पंख चींटी के निकले बनी शाइरा
आन लिपटे मकोड़े ग़ज़ल हो गई
अपने शेर पेलने का एक अलग ही आंनद होता है और उस आनंद की ही खातिर हमने सस्ता शेर ज्वाइन ( अवैतनिक) करने के बाद से कोई भी शेर किसी दूसरे का नहीं पेला । अपने ही माल से काम चला रहे हैं बल्कि रोज ही खुद ही लिख रहे हैं । और लिख लिख कर ही पेल रहे हैं ।
चलिये एक और याद का शेर प्रस्तुत है
तेरे भाई वो नाटे और काले याद आते हैं
जो होते होते रे गय वो ही 'साले' याद आते हैं
ग़ज़ब मारा था उस जालिम ने यूं के आज तक हमको
वो दिन जो हस्पतालों में निकाले याद आते हैं
आपने मेरी खड़ी खड़ाई ग़ज़ल को पसंद किया उसके लिये पार्टी आपका शुक्रिया अदा करती है और विश्वास दिलाती है रवि रतलामी जी को कि सभी प्रकार की वे ग़ज़लें उनको सुनने को मिलेंगीं जो वे चाहते हैं
अर्ज़ किया है
बाप को उनके बनाते मूर्ख हम चुपचाप से
और माशूका के भाई के भी बचते ताप से
या ख़ुदा तूने हमें भेंगा बनाया क्यों नहीं
देखते महबूब को और बात करते बाप से
अशोक जी ने लिखा है कि नशा दाने दाने को मोहताज कर देता है ये उन्होंने एक ट्रक पर से पढ़ा है । अब ये तो उन्होंने नहीं बताया कि वे ट्रक के पीछे क्या कर रहेथे । खैर मैं जवाब दे रहा हूं और हां एक बात पहले ही बात देता हूं कि भले ही सस्ता शेर पर वैधानिक चेतावनी लगी है कि शेर जरूरी नहीं हैं कि लिखने वाले के ही हों पर मैं तो अपने और केवल अपने ही ताज़ा लिखें पेश कर रहा हूं सो चुराने की कोशिश करने पर कापीराइट लग जाएगा ( वैसे हिन्दुस्तान में कापीराइट चलता ही कितना है )
न दे गर कोई खाने को नहीं दाना भी दे कोई
मगर पीने को तो देगा भला मानुस अगर होगा
आपने कभी खड़ी हुई ग़ज़ल देखी है । यक़ीनन नहीं देखी होगी हुई ही नहीं तो आप देखेंगें कहां से दरअस्ल में तो गज़ल या तो बैठी हुई होती है ( मयखाने में ) या फिर लेटी हुई होती है ( उनकी ज़ुल्फों की घनेरी छांव में ) । ये पहला प्रयोग किया जा रहा है कि ग़ज़ल को खड़ा किया जा रहा है अपने पांवों पर । ग़ज़ल को खड़ा करने के पीछे शायर का क्या मकसद है ये तो उसको खुद को भी नहीं पता पर फिर भी लिखी है तो सुन लो ।
इधर हम खड़े थे, उधर वो खड़े थे
उधर वो खड़े, हम इधर को खड़े थे
खड़े थे इधर हम, खड़े थे उधर वो
खड़े वो उधर, हम इधर जो खड़े थे
न पूछो ये हमसे खड़े थे किधर हम
खड़े तुम उधर, हम इधर तो खड़े थे
बड़ी राह देखी तुम्हारी यहां पर
उधर तुम थे और हम इधर लो खड़े थे
भले तख्ती कर लो बहर में मिलेगा
के दोनों मिलाकर के दुइ ठो खड़े थे
चलो सुन लो मकता ख़तम खेल हो ये
वहां कुल मिलाकर के हम दो खड़े थे
हमें हर वक़्त लगता था हमें वे देखती हेंगी
अगर यूं देखती हैं तो यक़ीनन दिल भी वो देंगी
मगर कमबख़्त कि़स्मत को कहां पर रोइये जाकर
ग़लतफ़हमी हमारी थी उधर तो आंख थी भेंगी