काकेश जी की पिछली पोस्ट को पढ कर कलम चल पड़ी और इस सस्ते शेर का ज़न्म हुआ :
चला था ढूँढने उसको ,निगाहें मेरी अम्बर पर
गया जब पाँव खड्ड़े में, तभी मैनें ’खुदा’ जाना ।
महंगाई के दौर में एक राहत की सांस
कई बरस पहले एक दोस्त ने मोहन मीकिन्स कम्पनी की एक डायरी गिफ़्ट की थी। उस में एक उम्दा सस्ता शेर था। मुझे हैरत है वह अब तक यहां कैसे नहीं पहुंचा:
इज़हार-ए-मोहब्बत पे वो मरम्मत हुई मेरी
पहले था मेरे दिल में, अब घुटने में दर्द है.




मुझे बताओ ये अंग्रेजी की बोतल में देसी की बू क्या है
हम तो हिन्दी की जानते थे, अंगरेजी की लू क्या है
कह रहे हैं मनीष की ऐसे ही गए थे, चलो मान ली
पर जिसके लिए न जाए कोई एक्स्क्लुसिव्ली, वो खूबरू क्या है?








फलां कम्पनी ढिकां कम्पनी रोज एक नया बंदा बैग लटकाए दरवाजे पर खड़ा मिलता है और कहता है आपका बस आधा घंटा चाहिये कुछ समझाना है सो मैंने कहीं सुनी ये पंक्तियां लिख कर बाहर टांग दी हैं आप भी ऐसा कर सकते हैं मुझे तो ये करने से मुक्ति मिल गई है ।
बीमा ना करवाइये जा से कछु ना होय
पैसा पत्नी को मिले मरण आपका होय









अब अपन होली के हुरियारे होने लगे हैं होली के दस दिनन पेले से ही हमको होरी की मस्ती चड़बे लग जाए है सो हम जाने किसकी ये लाइनें पेल रहे हैं
थी ग़ज़ब की मुझमें फुर्ती ग़मे आशिक़ी के पहले
मैं घसीटता था ठेला तेरी दोस्ती के पहले
तेरी बाल्टी पकड़ने मैं खड़ा रहा था वरना
मेरा डोल भर चुका था तेरी बाल्टी के पहले
चाचा गालिब से माफी मांगना जरूरी हो तो ये काम मेरी और से इरफान भी कर लें. हम चूंकि पेटेंट का कानून आने के पहले से उनकी बौद्धिक सम्पदा के नकली वारिस हैं, लिहाजा नक़ल करना और वो भी अक्ल से हमारा मौलिक हक़ है. हम यही मान कर यह कर रहे हैं. आगे जिसे जो करना हो कर ले :
गिरिया निकाले है तेरी बोतल से किसको
हाय! कि पीने पे इख्तियार नहीं है
हमको बहुत है बोतल न हो तो अद्धा-ऐ-क्वाटर
अफसोस कि साथ देने को कोई तैयार नहीं है.