Tuesday, 5 May 2009

मैं मर भी न पाऊँगा अब ज़हर खाके...

मैं गाता हूँ जब मूड अपना बना के,
गधे रेंकते हैं मेरे घर में आ के,

मेरी नौकरी जब से छूटी है तब से,
निकलते हैं सब यार बटुआ छुपा के, 

हुई बंद बनिये की भी अब उधारी,
मैं मर भी न पाऊँगा अब ज़हर खाके,

मैं कड़का सही तुम मेरे घर तो आओ,
खिलाऊँगा तुमको मैं मुर्गा चुरा के,

मुझे क्या खबर थी कि जूते पड़ेंगे, 
मुझे ले गये अपने घर वो पटा के, 

मुझे तेरे पापा से शिकवा नहीं है, 
कि पीटा उन्होंने तो खाना खिला के, 

बचा बज़्म में कोई सामीं न 'सस्ते',
मैं फ़ारिग हुआ जब गज़ल अपनी सुनाके....

Sunday, 3 May 2009

आम के आम

गर्मी हुई आँधी चली पेड़ों से गिरे आम ।
आइए जी चटनी खायें सुबह और शाम।
(कृपया इसको पूरा और ग़ज़ल का रूप देने में मदद करें । अच्छा इनाम भी पायें!)

Monday, 27 April 2009

उसे उर्दू जो आती तो मुझे कच्चा चबा जाता....

ग़रीबी ने किया कड़का, नहीं तो चाँद पर जाता,
तुम्हारी माँग भरने को सितारे तोड़कर लाता,

बहा डाले तुम्हारी याद में आँसू कई गैलन,
अगर तुम फ़ोन न करतीं यहाँ सैलाब आ जाता,

तुम्हारे नाम की चिट्ठी तुम्हारे बाप ने खोली, 
उसे उर्दू जो आती तो मुझे कच्चा चबा जाता,

तुम्हारी बेवफाई से बना हूँ टाप का शायर,
तुम्हारे इश्क में फँसता तो सीधे आगरा जाता,

ये गहरे शे’र तो दो वक़्त की रोटी नहीं देते, 
अगर न हास्य रस लिखता तो हरदम घास ही खाता, 

हमारे चुटकुले सुनकर वहाँ मज़दूर रोते थे,
कि जिसका पेट खाली हो कभी भी हँस नहीं पाता,

मुहब्बत के सफर में मैं हमेशा ही रहा वेटिंग,
किसी का साथ मिलता तो टिकट कन्फर्म हो जाता,

कि उसके प्यार का लफड़ा वहाँ पकड़ा गया वर्ना,
नहीं तो यार ये क्लिंटन हज़ारों मोनिका लाता....

- Hullad Moradabadi

Sunday, 26 April 2009

मुंशी मुनक़्क़ा साहब का अगला कता

आज मुंशी मुनक़्क़ा साहब
पिछली ख़ता को माफ़ फ़रमाते हुए
अगला कता फ़रमाते हैं-
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मैं क्यों बनवाऊँ मोची से
ख़रीदूं क्यों मैं बाटा से
जुमा के दिन तो हर मसजिद में
हर कीमत का मिलता है.

Friday, 24 April 2009

सस्ते पे सस्ता

***
हर सस्ते शेर में दारू नहीं होता।
जैसे कि हर बैल मारू नहीं होता।

पेश है मुंशी मुनक़्क़ा साहब का एक कता

एक मजाहिया फिल्म अभिनेता हुए हैं मुंशी मुनक़्क़ा.
मुग़ल-ए-आज़म और पाकीजा जैसी फिल्मों में उन्होंने काम किया था.
मुनक़्क़ा साहब सिर्फ अभिनेता नहीं थे बल्कि मजाहिया शायरी भी किया करते थे.
पेश-ए-खिदमत है उनका कता-

कभी इज्ज़त का मिलता है
कभी ज़िल्लत का मिलता है
मगर मजबूत और बढ़िया
बड़ी बरकत का मिलता है.

Wednesday, 22 April 2009

पव्वा संबन्धी शेर


ज़माने से न दब ग़ालिब तू उसके लिए हो जा हऊवा

खीसे को कर ज़रा ढीला, हलक से उतर ले पव्वा !!

Tuesday, 14 April 2009

बाइक सम्बन्धी शेर






मुद्द- आ है कमबखत ये अपनी-अपनी लाइकिंग का



बुरा है पै क्या कीजे इस शौक़ ऐ अज़ीम बाइकिंग का

Sunday, 12 April 2009

ऐसे वैसे कैसे



कैसे कैसे ऐसे वैसे हो गए
ऐसे वैसे कैसे कैसे हो गए

एक बार फ़िर


मेरे शुरुआती शेर रोमन स्क्रिप्ट में हैं चूंकि तब हिन्दी टाइप के जुगाड़ से खाकसार वाकिफ़ न था (अभी भी 'खाक ' के नीचे नुक्ता कैसे बिठाऊँ ये राज़ है मेरे लिए )। बहरहाल , उन तमाम शेर-चीतों , गीदड़ -बघीरों को देवनागरी में लाना चाहता हूँ ताकि देवता भी इनका मज़ा ले सकें । एक तस्वीर देखें --


याद उन शामों की अब भी बसी है मेरी नसों में


वो ले के पव्वा करना सफर रोडवेज़ की बसों में

Friday, 10 April 2009

बुरी संगत का शेर




मली से खट्टा नीम्बू , नीम से करेला कड़वा



और जो न पीवे न पीन दे ऐसा यार भड़वा

'सेविंग द' फिग लीफ़' शायरी






नक़्श हुआ कीजे फरियादी किसी की शोखिए तहरीर का



हर जतन से रखियो सलामत पत्ता मगर अंजीर का





Thursday, 9 April 2009

स‌स्ता शेर के लिएइंतखाब के नवाब

देख लीजिये फिर ये जनाब आये हैं
स‌ाथ अपने पांच स‌ाला इंकलाब लाये हैं
रोटी की शिकायत क्या खाक करते हैं
ये तो फिरंगी जूस का स‌ैलाब लाये हैं
आपको फुर्सत नहीं ढाई आखर पढ़ने की
ये आलमी भाईचारे का किताब लाये हैं
जुल्म-सितम की अब कभी बात न होगी
ये अमन-ओ-चैन वाला जुर्राब लाये हैं
किस्मत आप फूटी है, इन्हें क्यों कोसना
ये बूढ़ों को जवान करने का हिस‌ाब लाये हैं
अब कहने की ज़रूरत नहीं कि गरीब हैं
हमस‌ाथ अपने ये दौलत बेहिसाब लाये हैं
चंद दिनों की बात है, फिर आप ही कहेंगे
इंतखाब के जरिये नया नवाब लाये हैं

नदीम अख्तर
द पब्लिक एजेंडा

Wednesday, 8 April 2009

आ जाये मुसीबत....

आ जाये मुसीबत तो हटाये नहीं हटती,
उम्र और महँगाई घटाये नहीं घटती,
इश्क़ को बैंक बैलेंस ज़रूरी है दोस्त,
कँगलों से लड़की पटाये नहीं पटती...

ककहरे का कहर







इस दर पे सीखा है ज़ालिम, मैंने बिलोगिंग का ककहरा !

मना लेन दे ऐ खबीस यहीं मुज्को ,दीवाली ईद, दशहरा !!








चित्र : मेमने पर लाड लुटाते मयखान्वी
( सौजन्य :बाबा बोर्ची स्मृति प्रतिष्ठान )

Monday, 6 April 2009

साथियो , अबे मेरे कलेजे के टुकडो सुनो.....


दारू छनती बड़ी जगह ,पर नम्बर वन तो सोलन है ,




सस्ता - शेर कोई ब्लॉग नहीं ये तो इक आन्दोलन है !

Friday, 27 March 2009

इत्ता गंदा मत सोचा कर...

जनाब फ़रहत शहज़ाद साहब से माफ़ी की गुज़ारिश के साथ-

उल्टा सीधा मत सोचा कर,
पिट जावेगा मत सोचा कर,

'भ' से भूत भी हो सकता है,
इत्ता गंदा मत सोचा कर,

दिन में बीसों बार फ़टी है,
इसका फ़टना मत सोचा कर,

शाम ढले घर भी जाना है,
अद्धा पव्वा मत सोचा कर,

लड़की को तू छेड़ के प्यारे,
चप्पल जूता मत सोचा कर,

शे'र कहा है दाद तो दीजे,
महँगा सस्ता मत सोचा कर..

Tuesday, 24 March 2009

बिना ऊंट के रेगिस्तान मुकम्मल नहीं होता

बिना ऊंट के रेगिस्तान मुकम्मल नहीं होता
बिना मुर्दे के कब्रिस्तान मुकम्मल नहीं होता
बिना मुश के पाकिस्तान मुकम्मल नहीं होता
और, तारीख गवाह है, बुत परस्तों के लिए
बिना बुद्ध के बामियान मुकम्मल नहीं होता
हर अच्छाई के बाद बुराई भी जरूरी है, क्योंकि
बिना मुफ्तखोरी के शैतान मुकम्मल नहीं होता
शाया शेर को सराहें न स‌ही, पर यह भी स‌ोचें
बिना दाद के कोई खाकसार मुकम्मल नहीं होता
-Nadeem Akhtar
Public Agenda

Tuesday, 10 March 2009

फूल

फूल लेकर फूल आया, फूलकर मैने कहा,
फूल का तुम क्या करोगे , तुम तो खुद ही फूल हो।

Monday, 9 March 2009

किसको सींचूँ सोचे पानी?

बच्चों पर आ गई जवानी,
टी.वी. तेरी मेहरबानी,

खर-पतवार उगे गेहूँ में,
किसको सींचूँ सोचे पानी,

वो दिल्ली का हल्वा लाया,
खाने वाली हुई दिवानी,

राम सनेही भूखे बैठे,
रावण-प्रिय खाते गुडधानी,

चूहों ने संगठन कर लिया,
फेल हो गई चूहेदानी,

चूहा बनकर जिये आदमी,
घर में बीवी की कप्तानी,

बदल गये हैं तेवर अब तो,
साथ बीन के भैंस रँभानी...

Friday, 13 February 2009

मुझे कोई ऐसा क़माल दे बाबा...

मुझे कोई ऐसा क़माल दे बाबा,
जो हर आफ़त को टाल दे बाबा,

कम आमदनी से घर नहीं चलता,
मेरी भी लाँटरी निकाल दे बाबा,

दिल में कोई हसरत बाकी ना रहे,
मुझको इतना सारा माल दे बाबा,

घरवाली के हाथ न लग जाएँ कहीं,
बाहरवाली के ख़त सँभाल दे बाबा,

जो माँगें तेरे बस की न हों ,
बेहतर है कल पे टाल दे बाबा.....

Wednesday, 11 February 2009

नज़्म - 'बक़रा'

क़ाश! मैं भी ऐ बकरे तेरा मालिक होता,
तो बड़े नाज़ से नखरे से बड़ी शान के साथ,
दिखा के सबको मुहल्ले में नहलाता तुझको,
तेरे दो दाँत मैं सब ही को दिखाया करता,
जब कभी सोच में डूबा मैं तुझे घुमाया करता,
तो फिर मूड मे सींगें तू मुझे मारा करता,
मैं तेरे हमलों की शिद्दत से भड़क सा जाता,
जब कभी रात को तू भागने की कोशिश करता,
मैं तेरे कान पकड़ के तुझे लातें धरता,
फिर तेरी दाढी पकड के प्यार से तुझे डाँटा करता,
"अब बता बँधी रस्सी तोड़ के जायेगा क्या?"
मुझे बेताब सा रखता तेरे भागने का नशा,
तू मेरे घर में हमेशा ही गंद मचाता रहता,
तेरी मेंगनी से मेरा घर बस्साता रहता,
कुछ नहीं तो बस तेरा बेनाम सा आशिक़ होता,
क़ाश! मैं भी ऐ बकरे तेरा मालिक होता...

Monday, 9 February 2009

तुम्हारा छोकरा तो लोफ़र दिखाई देता है...

जो उनके हाथ में पेपर दिखाई देता है,
वो खाकसार का लेटर दिखाई देता है,

हज़ार बार तुम करो तारीफ़ लेकिन मौलाना,
तुम्हारा छोकरा तो लोफ़र दिखाई देता है,

कहीं ये मेरी वफ़ाओं का सिला तो नहीं है,
जो ओखली में मेरा ही सर दिखाई देता है,

ये कपडे पहनने का ढब तुम्हारा माशाअल्लाह!,
तुम्हारा जिस्म तो क्लीयर दिखाई देता है,

जतन हज़ार किये तब जा के चढीं हाँडियाँ,
भूखे नंगों को तो बस लंगर दिखाई देता है,

मिलेगा 'पद्म-श्री' का अवार्ड 'सस्ते' को,
ये तो 'A' ग्रेड का जोकर दिखाई देता है...

Friday, 6 February 2009

ऐ मेरे बच्चे मेरे लख्ते-जिगर...

ऐ मेरे बच्चे मेरे लख्ते-जिगर पैदा न हो,
याद कर पछतायेगा तू मेरे घर पैदा न हो,
तुझको पैदाइश का हक़ तो है मगर पैदा न हो,
ऐ मेरे बच्चे मेरे लख्ते-जिगर पैदा न हो,

हमने ये माना पैदा हो गया, खायेगा क्या,
घर में दाने ही नहीं पायेगा तो भुनवायेगा क्या,
इस निखट्टू बाप से माँगेगा तो पायेगा क्या,
देख कहा मान ले, जाँ-ए-जबर पैदा न हो,
ऐ मेरे बच्चे मेरे लख्ते-जिगर पैदा न हो,

यूँ भी तेरे भाई-बहनों कि है घर में रेल-पेल,
बिलबिलाते फिर रहे हैं हर तरफ़ जो बे-नकेल,
मेरे घर के इन चरागों को मयस्सर कब है तेल,
ऐ मेरे बच्चे मेरे लख्ते-जिगर पैदा न हो,

पालते हैं नाज़ से कुछ लोग कुत्ते बिल्लियाँ,
दूध वो जितना पियें और खायें जितनी रोटियाँ,
ये फ़िरासत* ऐ मेरे बच्चे मुझे हासिल नहीं,
उनके घर पैदा हो और बन के बशर पैदा न हो,
ऐ मेरे बच्चे मेरे लख्ते-जिगर पैदा न हो...

*फ़िरासत= क़ूव्वत,क्षमता,हैसियत

Wednesday, 4 February 2009

जो ताकतवर हो...

जो ताकतवर हो उसे महान कहना ही पड़ता है,
कमज़ोर दोस्तों को पहलवान कहना ही पड़ता है,

जो रिश्तेदार अपने घर जाने का नाम ना लें,
मज़बूरी में उन्हें मेहमान कहना ही पड़ता है,

घर वाली को खुश रखने की खातिर अक्सर,
उसे "तू है मेरी जान" कहना ही पड़ता है,

जिसने ज़िंदगी भर हसीनों के सैंडल सहे हों,
ऐसे आशिक़ को पार्टी की शान कहना ही पड़ता है..

Monday, 26 January 2009

गणतंत्र दिवस की सभी भारतवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं

झण्डा ऊंचा रहे हमारा।
आज गणतंत्र दिवस के अवसर पर आईए कसम खा लें कि देश में आतंकवाद को पनपने नहीं देंगे और आतंकी को घुसने नहीं देंगे।


जय हिन्द!

Friday, 23 January 2009

...किसका था?

गुलाम अली की गाई एक बड़ी पुरानी ग़ज़ल है. आपने सुनी ही होगी. घबराइए मत, मैं वह आपको सुनवाने नही जा रहा हूँ. मैंने तो बस उसका एक कलजुगी संस्करण तैयार किया है. मैं यहाँ वही ठेल रहा हूँ. अगर आप झेल सकते हैं तो झेलें. आगे तो समझदार हैं ही ख़ुद ही समझजाएँगे की मैं किस ग़ज़ल की बात कर रहा था:

  • तुम्हारे छत में नया ik धडाम किसका था
  • न था अमीन तो आख़िर वो काम किसका था
  • लिखा न बिल में वो खर्च मगर कर्ज रहा
  • मुनीम पूछ रहा है मकान किसका था
  • वफ़ा करेंगे निभाएँगे बात मानेंगे
  • हमें तो याद नहीं ये कलाम किसका था
  • गुजर गया वो जनाना कहूं तो किससे कहूं
  • रयाल दिल से मेरे सुबहो-शाम जिसका था

मत जान बूझ अनजान बनो

मत जान बूझ अनजान बनो

तुम हो मेरी जीवन रेखा
न मरने का सामान बनो
मत जान बूझ अनजान बनो

मैं बनू तुम्हारी केटरीना
और तुम मेरे सलमान बनो
मत जान बूझ अनजान बनों

मैं बन जाऊं पालक-पनीर
तुम पूरी या फ़िर नॉन बनों
मत जान बूझ अनजान बनों

जहाँ मुर्दे भी रोमांस करें
तुम ऐसा कब्रिस्तान बनों
मत जान बूझ अनजान बनों

Sunday, 11 January 2009

बकबक

बहुत दिन से सुन रहां हूं सस्ते शेर,
आपकी बकबक, इनकी बकबक ,उनकी बकबक।
बर्दाश्त की हो गई है हद,खामोश हो जा ,या
और बक ,खूब बक , मेरी बला से करेजा बकबक।

Thursday, 25 December 2008

ये दिल है, ये जिगर है, ये कलेजा..

मुशायरे में एक शायर ने अपना क़लाम सुनाते हुए पढा-

"ये दिल है, ये जिगर है, ये कलेजा"

गौर फ़रमाएं-

"ये दिल है, ये जिगर है, ये कलेजा",

"ये दिल है, ये जिगर है, ये कलेजा",


लोगों में से किसी ने आवाज़ उठाई-


"खस्सी लाया है सौगात क्य-क्या"

Wednesday, 17 December 2008

बुढ़ापे की ग़ज़ल!!

ऐसा नहीं के उनसे मोहब्बत नहीं रही
जज़्बात में वो पहले सी शिद्दत नहीं रही

सर में वो इन्तज़ार का सौदा नहीं रहा
दिल पर वो धड़कनों की हुकूमत नहीं रही

पैहम तवाफ़-ए-कूचा-ए-जाना के दिन गये
पैरों में चलने फिरने की ताक़त नहीं रही

कमज़ोरी-ए-निगाह ने संजीदा कर दिया
जलवों से छेड़-छाड़ की आदत नहीं रही

चेहरे की झुर्रियों ने भयानक बना दिया
आईना देखने की भी हिम्मत नहीं रही

अल्लाह जाने मौत कहां मर गई 'ख़ुमार'
अब मुझको ज़िंदगी की ज़रूरत नहीं रही

-- ख़ुमार बाराबंक्वी

Saturday, 29 November 2008

यकीन है इक रोज़ जायेगी जान दिल्ली में...

यकीन है इक रोज़ जायेगी जान दिल्ली में,
तलाश करते हुए एक मकान दिल्ली में,
तमाम दिन के सर-ए-राह हम थके हारे,
शिकम में चूहे उछलते थे भूख के मारे,
बड़ा था मेरा शिकम,दोस्तों मैं क्या करता,
रकम थि जेब में कम,दोस्तों मैं क्या करता,
चला खरीद के तरबूज सू-ए-दश्त-ए-हक़ीर्,
लगी जो पाँव में ठोकर, सँवर गयी तक़दीर,
गम-ए-हयात की रातों में दिन निकल आया,
गिरा जो हाथ से तरबूज,जिन्न निकल आया,
अदब से बोला कि अदना ग़ुलाम हूँ आका,
जो हो सके ना किसी से करूँ वो काम मैं आका,
इशारा हो तो मैं रुख मोड़ दूँ ज़माने का,
बना दूँ तुमको मैनेजर यतीम-खाने का,
मेरे सबब से लतीफ़ा मुशायरा हो जाए,
पलक झपकते में शायर,शायरा हो जाये,
गुनाह-ओ-शिर्क कि रातों में आफ़ताब मिले,
इबादतें करें मुल्ला, तुम्हें सवाब मिले,
मैं आदमी नहीं,दुश्मन से साज़ बाज़ करूँ,
अगर मैं चाहूँ तो अहमक़ को सरफ़राज़ करूँ,
जो हुक़्म कीजे तो मुर्दे में जान डलवा दूँ,
मैं अह्द-ए-पीरि में, बीवी जवान दिलवा दूँ,
बजाएं सीटियाँ अब तल्खियाँ ज़माने की,
ये पकड़ो कुन्जियाँ क़ारूँ के खज़ाने की,
"नहीं है दिल की तमन्ना जहान दिलवा दे"
मैं हाथ जोड़ के बोला मकान दिलवा दे,
यह कह के घुस गया तरबूज में वो काला जिन्न,
अजीब वक़्त है बिगड़े हुए हैं सब के दिन,
ये सर्द-सर्द फ़िजाओं के गम यूँ ना सहते हम
मकान जो मिलता तो भला तरबूज में क्यूँ रहते हम?

Thursday, 13 November 2008

दुनिया अपने को बहुत सता रेली है...

दुनिया अपने को बहुत सता रेली है,
बात बात पे अपनी हटा रेली है,
जूली माल तो अपना खाती है,
पर सुना है पप्पू को घुमा रेली है,

कितना भी पी लो साला चढती ही नही,
दारू भी डुप्लीकेट आ रेली है,
मटके का माल भर के बोतल में,
मक्डावेल का लेबल आंटी लगा रेली है,

पुलिस भी जब दिल करे उठा रेली है,
बिना किसी लोचे के फ़टके लगा रेली है,
सूनसान इलाके में कहीं ले जाकर,
अच्छे अच्छों को टपका रेली है,
 
आजकल भाई लोगों की इज़्ज़त भी जा रेली है,
पाकेटमार को भी मीडिया डाँन बुला रेली है,
अपुन भी सोच रेला है पोलिटिक्स जायन करने का,
काम वोइच पर इज़्ज़त से डबल इन्कम आ रेली है,
 
चलो भाई लोग अपुन अभी चलता है,
सलमा अपुन को बुला रेली है,
"सस्ता" मिले तो बोलना चमाट खायेगा मेरे हाथ से,
आजकल उसे ज़्यादा समझ में आ रेली है.....

Wednesday, 12 November 2008

मुझसे पहले सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग...

(1)

सोई है तक़दीर ही जब पीकर के भाँग,
महँगाई की मार से टूटी हुई है टाँग,
तुझे फ़ोन अब न करूँगा P.C.O. से हाँगकाँग,
मुझसे पहले सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग...

(2)

दिल को आदत सी हो गई है चोट खाने की,
गम छुपाने की,भीगी पलकों से मुस्कराने की,
होता जो गुमाँ हमें इस खेल-ए-सेन्सेक्स का,
तो गलती न करते पैसे "निफ़्टी" में लगाने की...

Monday, 10 November 2008

सिगरेटिया गज़ल !














जल रही है जहाँ-जहाँ सिगरेट,
कर रही है धुआँ-धुआँ सिगरेट,

हिज्र की शब में रोशनी कब है,
है फ़क़त ये अयाँ-अयाँ सिगरेट,

रात जागने की कहीं जो बात आई,
हो गई रोशन वहाँ-वहाँ सिगरेट,

इसकी आदत है जल कर के गिरना,
पाओगे अब कहाँ-कहाँ सिगरेट,

हो ना मय की तलब,न साकी की,
कर दे ऐसा समाँ-समाँ सिगरेट,

कैसे छोड़ोगे अब इसे "सस्ते",
है रगों में रवाँ-रवाँ सिगरेट...

Saturday, 8 November 2008

आँखें भीग जाती हैं...

एक बार फ़िर अपने शादी-शुदा दोस्तों का हाल-ए-दिल बयान करने वाले चार शे'र पेश कर रहा हूँ. उम्मीद है ये शे'र उनके दर्दे-जहाँ, दर्दे-ज़ीस्त, और दर्दे-बीवी पर मरहम का काम करेंगे  :-)

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मेरी बेगम ने झोंक दी हैं सालन में वो मिर्चें,
निवाला मुँह में रखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं,

शादी की ये तस्वीरें बड़ी मुश्किल से ढूँढी हैं,
मैं अब इनको पलटता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं,

जमा-पूँजी मैं बिस्तर के सिरहाने रख के सोता था,
वहाँ अब हाथ रखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं,

मेरी शादी मेरी लग्ज़िश थी या गलती थी वालिद की,
मैं बीवी से जब ये सुनता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं...

Monday, 3 November 2008

राम युग में दूध मिला !!

जब से सस्ते शेर से जुड़ाव हुआ है...तब से बहुत से मित्र ट्रक के पीछे शेर पढ़ के मुझे फ़ोन करके ज़रूर भेजते हैं, शेर जो ट्रक और ऑटो के पीछे लिखा होता है कभी -कभी तो गज़ब का आनन्द दे जाता है, दिन भर के लिये कुछ कहने को मिल जाता है..ऐसे मेरे एक मित्र ने ये लाइन किसी ट्रक से उतारा है जिसे मैं पेश करने का सुख ले रहा हूँ,

राम युग में दूध मिला !
कृष्ण युग में घी !!
कलियुग में दारू मिली !
सोच समझ के पी!!

Saturday, 1 November 2008

रात भर दबा के पी, खुल्लम खुल्ला बार में...

यह रचना मित्र लेलेराम ने ई-मेल की थी.बाद में पता चला कि असल में ये अपने "उड़नतश्तरी" साहब कि गज़ल है, और लेले भाई ने उनका नाम उड़ा के अपना नाम चढा दिया था. बहरहाल, गज़ल का क्रेडिट "उड़नतश्तरी" साहब के नाम है...और उनसे इज़ाज़त की गुज़ारिश के साथ आपकी खिदमत में पेश है...

रात भर दबा के पी, खुल्लम खुल्ला बार में,
सारा दिन गुजार दिया बस उसी खुमार में,  

गम गलत हुआ जरा तो इश्क जागने लगा,
रोज धोखे खा रहे हैं जबकि हम तो प्यार में, 

कैश जितना जेब में था, वो तो देकर आ गये,
बाकी जितनी पी गये, वो लिख गई उधार में,

यों चढ़ा नशा कि होश, होश को गंवा गया,
और नींद पी गई उसे बची जो जार में,

वो दिखे तो साथ में लिये थे अपने भाई को,  
गुठलियाँ भी साथ आईं, आम के अचार में,

याद की गली से दूर, नींद आये रात भर, 
सो गया मैं चैन से चादर बिछा मजार में,

हुआ ज़फ़र के चार दिन की उम्र का हिसाब यूँ,
कटा है एक इश्क में, कटेंगे तीन बार में,

होश की दवाओं में, बहक गये "लेले" भी,
फूल की तलाश थी, अटक गये हैं खार में....

Friday, 31 October 2008

बुढ़ापा मत देना हे राम!

बुढ़ापा मत देना हे राम! बुढ़ापा मत देना हे राम!
साठ साल की बुढ़िया हो गई है बिल्कुल बेकाम।
बुढ़ापा मत देना हे राम!

आँत भी नकली, दाँत भी नकली आँख पे चढ़ गया चश्मा
काँटा लगा दिखाई ना दे तब्बू और करिश्मा
देख के भागे दूर लड़कियाँ जैसे हूँ सद्दाम।
बुढ़ापा मत देना हे राम!

परियों-सी सुंदरियाँ बोलें बाबा, कहें खटारा
ऊपर राख जमी लेकिन भीतर धधके अंगारा
मन आवारा बंजारा तन हुआ रसीला आम।
बुढ़ापा मत देना हे राम!

पहले बुढ़िया थी ऐश्वर्या मैं सलमान के जैसा
अब वो टुनटुन जैसी लगती मैं महमूद के जैसा
दिल अब भी मजनूँ जैसा है अंग-अंग गुलफ़ाम।
बुढ़ापा मत देना हे राम!

फ़ैशन टी.वी. वाली छमिया जी हमरा ललचाए
चले 'रैंप' पर मटक-मटक 'कैरेक्टर' फिसला जाए
कैसे जपूँ तुम्हारी माला जी भटके हर शाम।
बुढ़ापा मत देना हे राम!

'व्हिस्की' छूट गई लटकी है 'ग्लूकोज' की बोतल
जी करता 'डिस्को' 'पब' जाऊँ पाँच सितारा होटल
'डांस बार' में बैठूँ चाहे हो जाऊँ बदनाम।
बुढ़ापा मत देना हे राम।

पाल-पोसकर बड़े किए वो लड़के काम न आए
मुझे बराती बना दिया दुल्हन को खुद ले आए
मैं भी दूल्हा बनूँ खर्च हों चाहे जितने दाम।
बुढ़ापा मत देना हे राम!

उमर पचहत्तर अटल बिहारी को दी तुमने क्वारी
मेरी तो सत्तर है किरपा करिए कृष्ण मुरारी
गोपी अगर दिला दो तो बनवा दूँ तेरा धाम।
बुढ़ापा मत देना हे राम!

रोम-रोम रोमांस भरा है राम न दिल को भाएँ
अस्पताल जाऊँ तो नर्सें हँस-हँस सुई चुभाएँ
कामदेव यमराज खड़े हैं दोनों सीना तान।
बुढ़ापा मत देना हे राम!

लोग पुराना टीव़ी लेकर जाएँ नया ले आएँ
हम टूटी फूटी बुढ़िया को किससे बदलकर लाएँ
'फेयर एंड लवली' छोड़के बैठी रगड़ रही है बाम।
बुढ़ापा मत देना हे राम!

क्लिंटन की तो खूब टनाटन मिलवाई थी जोड़ी
मेरे लिए ना उपरवाले कोई मोनिका छोड़ी
खुशनसीब होता गर मुझ पर भी लगता इल्ज़ाम।
बुढ़ापा मत देना हे राम!

मेरे संग-संग हुई देश की आज़ादी भी बूढ़ी
जनता पहने बैठी नेताओं के नाम की चूड़ी
अंग्रेज़ों से छूटे अंग्रेज़ी के हुए गुलाम।
बुढ़ापा मत देना हे राम


-डॉ. सुनील जोगी

Wednesday, 22 October 2008

बीवी-नामा...

शौहर को इस तरह से सताती हैं बीवियाँ,
ताने सुना के आँख दिखाती हैं बीवियाँ,

इन बीवियों की भूख की शिद्दत न पूछिये,
खाने के साथ सर भी तो खाती हैं बीवियाँ,

कुछ लोग डर के नींद में बीमार पड़ गये,
सुनते हैं उनके ख्वाब में आती हैं बीवियाँ,

शौहर कि जेब से तो इन्हें प्यार है मगर,
उससे ही दुश्मनी भी निभाती हैं बीवियाँ...

Monday, 20 October 2008

हिंग्रेज़ी कविता...

क्या बिंदास हवा चल रही है,
बर्ड गाना गा रहे हैं,
काऊ लोग ग्रास ईट रहे हैं,
स्याणे लोग "सस्ता-शेर" पर लिख रहे हैं,
और
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ढक्कन लोग उसे पढ रहे हैं!! Talking 

Friday, 17 October 2008

इश्क़ में ज़िन्दगी मुहाल न हो...

इश्क़ में ज़िन्दगी मुहाल न हो,
तेरे जैसा हमारा हाल न हो,

ऐ ख़ुदा इतना पेट भर देना,
फिर कभी ख्वाहिश-ए-रियाल न हो,

वो भी रखता है जेब में कन्घी,
एक भी सर पे जिसके बाल न हो,

इश्क़ उससे कभी नहीं करना,
जेब में जिसके माल-वाल न हो,

उसको तोहफ़े में गालियाँ देना,
जिसकी शादी में श्रीमाल न हो,

बीवीयाँ खुश रहा नहीं करतीं,
खून में जब तक उबाल न हो...

Wednesday, 15 October 2008

हाथों में अब के साल भी पर्चियाँ हज़ारों हैं...

मेरी शादी के लिये दोस्तों लड़कियां हज़ारों हैं,
हर खिड़की में लड़की,और खिड़कियाँ हज़ारों हैं,

एक तुम ही नहीं अकेली मेरे जाल में फँसी,
इस जाल में तुम जैसी मछलियाँ हज़ारों हैं,

लिखा जो तुमने लव-लेटर तो क्या हुआ हुज़ूर,
हमारी दराज़ में इस जैसी चिट्ठियां हज़ारों हैं,

हम वो परवाने नहीं जो शमा पे जल मरें,
हमारे घर में पहले ही बत्तियाँ हज़ारों हैं, 

दिये थे पहले भी इश्क़ के इम्तहान बहुत,
हाथों में अब के साल भी पर्चियाँ हज़ारों हैं,

एक और गई हाथ से तो मलाल क्यूँ करें,
देखिये तो बाग में तितलियाँ हज़ारों हैं,

Monday, 13 October 2008

खट्टी कढी औ बैंगन बघारे...

दुआ करने गये किस्मत के मारे,
हुए मस्जिद से गुम जूते हमारे,

अमीरे-शहर की बेटी है कानी,
हुए दामाद के वारे-न्यारे,

वतन वापस आकर भी क्या मिला है,
वही खट्टी कढी औ बैंगन बघारे,

हर एक डरने लगा बीवी से अपनी,
मुक़द्दर किसके अब कौन सँवारे,

खुली जो आखँ तो कुछ भी नहीं था,
ना काज़ी, ना मैं, ना ही छुहारे...

Saturday, 11 October 2008

जी चाहता है...

बड़ी तवक्को के साथ हाज़िर कर रहा हूँ...सस्ता शे'र पर पोस्ट किये गये शे'रों में सबसे पाक़ शे'र...दिल थाम के पढिये...फ़िर जी खोल के मुझे गालियाँ(दाद) दीजिये-

जी चाहता है तेरी ले लूँ,
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सारी मुसीबतें उम्र भर के लिये,
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तुझ को देख कर मेरा उठा है,
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हाथ दुआ करने के लिये....

Friday, 10 October 2008

मुखतलिफ़ अश'आर..

(1)
इश्क़ में हमने क्या क्या पाया है?
हाथ पैर टूटे,मुँह से लहू आया है
अस्पताल पहुँचने पर नर्सों ने ये फ़रमाया है,
बहारों फूल बरसाओ,आशिक़ पिट के आया है..

(2)
(इरफ़ान जी से  माफ़ी की गुज़ारिश के साथ)

भाई इरफ़ान की शादी में हमने पी ली शराब,
भाई इरफ़ान की शादी में हमने पी ली शराब,
फिर जो हुई तबीयत खराब,
दे पेशाब पे पेशाब,दे पेशाब पे पेशाब..

(3)
इस खौफ़ से बाहर निकलना छोड़ दिया गालिब
कि कहीं कोई लड़की फिर खुदकशी न कर बैठे !

(4)
ये कह कर मकान-मालिक ने घर से निकाल दिया फ़राज़,
तू शाहीन है बसेरा कर पहाड़ों की चट्टानों में...

Wednesday, 8 October 2008

बकवास और टोटल टाईमपास...

ये बात समझ् में आई नहीं,
अम्मी ने मुझे समझाई नहीं,
मैं कैसे मीठी बातें करूँ,
जब मैनें मिठाई खाई नहीं,
जब बिल्ली शेर की खाला है,
फ़िर हमने इसे क्यूँ पाला है,
क्या शेर बहुत नालायक है,
जो खाला को मार निकाला है,

ये बात समझ में आई नहीं...

क्यूँ लंबे बाल हैं भालू के,
क्यूँ उसने शेव करवाई नहीं,
क्या वो भी गंदा बच्चा है,
या जंगल में कोई नाई नहीं,
ये बात समझ में आई नहीं,
अम्मी ने मुझे समझाई नहीं...

Monday, 6 October 2008

मुफ़त की रोटियाँ तोड़ो ससुर जी माल वाले हैं...

करीबन दो-ढाई महीनों से लगातार पोस्टीयाने की वजह से स्टाक की रौनक खतम होने लगी है.सो सस्ता लिखने का फ़ैसला करना पड़ा, नहीं तो अपनी दुकान बंद करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता. उम्मीद है ये कोशिश आपको अच्छी लगेगी-

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जहाँ की फ़िक्र को छोड़ो ससुर जी माल वाले हैं,
मुफ़त की रोटियाँ तोड़ो ससुर जी माल वाले हैं,

कि लो गाड़ी नई माडल,बिताओ फ़्रांस में छुट्टी,
कोई मौका नहीं छोड़ो ससुर जी माल वाले हैं,

ये मेरा सूट "अरमानी" ये मेरे शूज हैं "गुच्ची",
घड़ी "रोलेक्स"औ"राडो" ससुर जी माल वाले हैं,

सालियों औ सलहजों से निस्बतें भी ठीक हैं लेकिन,
निगाहें सास पर मोड़ो ससुर जी माल वाले हैं,

सहो बीवी के नखरे तुम दनादन जूतियाँ खाओ,
न उसका हाथ तुम पकड़ो ससुर जी माल वाले हैं,

सभी दामादों में तुमही तो इक चंगेज़ हो लेकिन,
मियाँ यूँ भी नहीं अकड़ो ससुर जी माल वाले हैं,

ये बातें भूल जाओ तुम कभी तुममें भी थी गैरत,
घर के सब आईने तोड़ो ससुर जी माल वाले हैं...

( दूसरा और तीसरा शे'र मित्र  रोहित जैन  के सौजन्य से)

Saturday, 4 October 2008

फ़ुटकर शे'र...

(1)
हर गली हर दीवार पर तेरा नाम है,
हर गली हर दीवार पर तेरा नाम है,
ऊपर लिखा है "चप्पल चोर"
और नीचे 5 रुपये का ईनाम है!

(2)
अगर ताँगे में आना था तो पीछे बैठ जाना था,
तेरे पहलू में बैठा कोचवाँ अच्छा नहीं लगता...

(3)
इश्क़बाजी में जान देने लगा,
और आहटों पे कान देने लगा,
जब से देखी पडोसी की मुर्गी,
मेरा मुर्गा अजान देने लगा..

(4)
महफ़िल में इस खयाल से आ गया हूँ मैं,
शायद मुझे निकाल कर कुछ खा रहे हों आप..

(5)
गुनगुनाता नाचता गाता हुआ दरकार है,
दिल को बहलाने की खातिर झुनझुना दरकार है,
इक सहेली दूसरी से हँस के बोली एक दिन,
जिस को शौहर कह सकूँ वो मसखरा दरकार है...

(6)
भैंस की दुम बेसबब नहीं गालिब,
कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है !

Wednesday, 1 October 2008

तुम्हारी भूख की खातिर मुझी पर क्यूँ अजाब आये?









तू पापी है तेरी ख्वाहिश है दामन में सवाब आये,
मगर कहता है दिल तेरा बेहिजाबी बेहिजाब आये,

फ़िट्टे उस मुँह से लेता है मेरी बेटी का तू जो नाम,
दुआ है खाक उस मुँह में तेरे भी बेहिसाब आये,

हिफ़ाज़त अब मेरे ईमान की मालिक ही करे लोगों!,
की फ़रमाइश थी ज़मज़म की वो लेकर के शराब आये,

मना कितना किया मैने कहाँ सुनते ससुर जी हैं,
जमीं पर गंद फैली थी पर वो पहने जुराब आये,
 
न जाने कौन सी आंटी ने इनको आँख मारी है,
कि पीरी में भी बुड्ढे पर बहार आये शबाब आये,
 
जो सर अपना झुकाये है, कहे रोकर वही गंजा,
शराफ़त है कहाँ की ये कि तोहफ़े में खिजाब आये,
 
मुझे खाओ नहीं पका के मैं हूँ मजलूम सा पंछी,
तुम्हारी भूख की खातिर मुझी पर क्यूँ अजाब आये? 

मेरे दुशमन की हर मुर्गी ने सोने के दिये अंडे,
मेरी मुर्गी से आये जो सभी अंडे खराब आये, 
 
गरीबी का ये आलम है के सब्ज़ी पर गुज़ारा है,
तेरी किस्मत में ऐ "सस्ते" न जाने कब क़बाब आये...


(चित्र "PETA" से साभार)