Thursday, 13 March 2008

"शाद" अज़ीमबादी से क्षमायाचना सहित




तड़पना है तो जाओ जा के तड़पो "शाद" खि़लवत में .....

"शाद" साहब नाशाद न होइयेगा, अब आगे माफ़ करियेगा

तड़पना है तो जाओ दारु मारो जा के ठेके में
वहाँ छक के पियो ओर फ़ोन पर कह दो "तड़पते हैं"

शायरी जितनी करो वो कम है ,शायरी जितनी करो वो कम है ,
दरअस्ल...................... सुखनवर कि ये दिमागी बलगम है !!!

रौ-ऐ -जज़्बात


खटमल दीवान में मेरे और ज़ख्म उनके हरे हुए
खटमल दीवान में मेरे और ज़ख्म उनके हरे हुए
जिंदे हैं अब भी जज़्बे कि जिनको माना मरे हुए !

पेल-ए-खिदमत है एक खटमल शेर

मुनीष भाई के 'दीवान' की पोल-

'दीवान' में खटमल है मगर दिख नहीं रहे,
भेजे में बहुत शेर हैं अपन लिख नहीं रहे.

-- विजय खटमलवी.

(गुरु, इतना ठीक है कि स्तर और गिराएं. कमर कस ली है कि सस्तई के अखाड़े की लाईट वेट कैटेगरी में गोल्ड मेडल हासिल करके ही दम लेना है. हैवी वेट कैटेगरी की कुश्ती इरफ़ान भाई के लिए आरक्षित है. जय बजरंगबली!)

पेल-ए-खिदमत है एक खटमल शेर

मुनीष भाई के 'दीवान' की पोल-

'दीवान' में खटमल है मगर दिख नहीं रहे,
भेजे में बहुत शेर हैं अपन लिख नहीं रहे.

-- विजय खटमलवी.

(गुरु, इतना ठीक है कि स्तर और गिराएं. कमर कस ली है कि सस्तई के अखाड़े की लाईट वेट कैटेगरी में गोल्ड मेडल हासिल करके ही दम लेना है. हैवी वेट कैटेगरी की कुश्ती इरफ़ान भाई के लिए आरक्षित है. जय बजरंगबली!)

दीवान इक्क दीवाने का !!


मेरा 'दीवान ' है आबनूस का ये कोई खटिया नहीं है
हाँ शेर हैं कुछ सस्ते ज़ुरूर मगर घटिया नहीं हैं !!!

थानेदार शायर!

आजकल मैं साग़र खैय्यामी साहब के खुमार में डूबा हूँ. जब होश आता है तो उनका कोई शेर चढ़ा देता हूँ. मुलाहिजा फ़रमाइए-

रफ़्ता-रफ़्ता हर पुलिस वाले को शाइर कर दिया,
ऐसा इक क़ानून भी बनवा दिया सरकार ने.
सुब्ह को इक कैदी फाँसी लगाकर मर गया,
रात भर गज़लें सुनाईं उसको थानेदार ने.

हैं शेर-पहम सब मेरे साले कमाल के

शायर अगर मुश्किलों न घिरे तो बड़ा शायर नहीं बन सकता. पापुलर मेरठी साहब की मुश्किलें देखिये. आख़िर एक शायर को क्या चाहिए? दाद (ग़लत मत समझिए, मैं वाह वाह की बात कर रहा हूँ) . लेकिन साहब को उनके सालों से मिली तारीफ गंवारा नहीं है. वो लिखते हैं;

हैं शेर-पहम सब मेरे साले कमाल के
बैठे हैं शायरी का समंदर खंगाल के
तारीफ कर रहे हैं वो यूं मेरे शेर की
कागज़ पर रखा दिया है कलेजा निकाल के

उनकी एक और मुश्किल के बारे में बताते हुए लिखते हैं;

रहा करता है खटका जाने क्या अंजाम हो जाए
ख़बर ये आम हो जाए तो फिर कोहराम हो जाए
मोहब्बत हो गई है डाकू सुल्ताना की बेटी से
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए

Wednesday, 12 March 2008

सस्ता शेर : स्वास्थ्य की ओर !!

''सस्ता शेर एक अद्भुत ब्लॉग है , ऑरों से ज़रा हटके । इस पर एक स्टोरी करो यार अपने सन्डे एडिशन में '' उस रोज़ जब मैंने ये बात इंडियन एक्सप्रेस की अपनी एक मित्र से कही तो उन्होंने बड़ा रस लेकर इसे आद्योपांत पढ़ा और कुछ झिझकते हुए कहा कि माल तो सही है मगर इंग्लिश प्रेस के नज़रिये से स्टोरी में ट्विस्ट सिर्फ़ ये है के ये हिन्दी का शायद पहला ''गे''(GAY) ब्लॉग है । ये सुनकर उसकी साँसों से धुंधले पड़ते अपने चश्मे के शीशे साफ करते हुए मैंने पूछा क्यों भई तुम्हे मुझ पर तो शक नहीं होना चाहिए । तब आपने फ़रमाया ..''वो बात नहीं है मगर इसका फर्स्ट हैण्ड इम्प्रेशन कुछ ऐसा जा रहा है , अब देखो तुमने इसमे कुछ सोनी-सोनी तस्वीरें चेपी , कई मर्तबा दारू की भी चेपी दिख रही हैं मगर..मगर दारू की बोतलों पे तो कमेंट फ़िर भी आए मगर सुंदर लड़की वाली पोस्टों को कोई तवज्जो नहीं मिली , अब या तो सारे मेंबर बहोत धार्मिक किस्म के हैं या फ़िर मार्मिक किस्म के हैं....खल्लास ..बोलो करूं स्टोरी ? '' मैंने आज तक इस नज़रिये से सोचा ही न था मगर एक पत्रकार कह रही थी , वो भी अंग्रेज़ी की कोई भास्कर-चासकर टाइप नहीं !!
ये सुन कर जायका तो बहुत ख़राब हुआ मगर क्या कहना था , मैंने कहा 'अच्छा ' वो बोली 'ठीक'। ये बात हुई लास्ट -वीक । जी काफ़ी ख़राब रहा सो मैंने एस ए टेस्ट पोस्ट
'लम्पट प्रार्थना' वाली पोस्ट चेपी । परिणाम वही ढाक के तीन पात । ले देके एक परम जीत बाली का कमेंट आया मगर वो तो मेंबर हैं नहीं । शक यकीन में बदलता लगा मगर फ़िर आखरी try के तौर पे मैंने खुले आम सब मेम्बेर्स
का ध्यान इस तरफ़ खींचा की कोई लड़की यहाँ contribute नहीं करती है, ये बड़ी अब्नोर्मल बात है वगैरह ..वगैरह । नतीजा .......अब तो खैर आपके सामने है.....मनीषा ने ब्लॉग को अब्नोर्मल घोषित होने से बचा लिया है ..उम्मीद है और लड़कियां भी यहाँ लिखने लगेंगी .....मगर साब मेरी जिस पोस्ट को मनीषा ने इतनी शिद्दत से ..,शायद एक चुनौती की तरेह भी लिया किसी एक करम जले मेंबर ने इतनी मौलिक बात पर टिप्पणी तो दूर ,भाईसाब चूं तक नहीं की । अशोक पांडे इस समय केरल में हैं सो वो excluded हैं । और जो लोग न पढ़ पाये हों उन्हें भी मैं करम जलों में नहीं रखता । मगर है कमाल । बहरहाल , शुक्र है की अब ये ब्लॉग 'सामान्य' हो चला है और स्वस्थ परम्पराके मार्ग पर अग्रसर रहेगा ।
एक शेर अर्ज़ है , बहोत पुराना है :
'' झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए , लिखती है कन्या लिखवाने वाला चाहिए ''
मैं हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ मनीषा जी का और उन तमाम ब्लॉग बालाओं का जो इसी तरेह यहाँ लिखेंगी और इस ब्लॉग की फला -ओ -बहबूदी में हमारी हिस्सेदार होंगी । जय सस्तापन । जय बोर्ची.!!!

उम्‍दा सस्‍तत्‍व को प्राप्‍त एक रचना



सस्‍ता शेर में मेरी पहली सस्‍तत्‍व को प्राप्‍त प्रस्‍तुति, थोड़ी बनाई, थोड़ी चुराई।

समय समय की बात है
बकरी मारे लात है
काउ खाती घास है
दुनिया बड़ी उदास है
मुझको इस दुनिया से
अब ना कोई आस है
फोड़ दूं मैं सिर उसका
जो बोले, पोयम मेरी बकवास है।

कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है....

कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है

कि


कि


कि


कि

उफ़

आज नहीं आया

कहा ना, कभी- कभी तो आता है ।

और अब सुनिये झड़ी हुई ग़ज़ल

प्रदीप चौबे जी की ग़ज़ल को खूब पसंद किया गया और किया भी क्‍यों न जाए है भी तो वैसी ही शख्‍सीयत । आज सुनिये डॉ महेंद्र अग्रवाल जी की एक गज़ल़ के कुछ शेर

अदबी अदब के वास्‍ते जिद पर अड़े हुए

चप्‍पल हवा में उड़ गई जूते खड़े हुए

माइक पकड़ के हो गए शायर अवाम के

आंधी के आम बीन जो लाए झड़े हुए

अदबी तो मानिये मुझे शायर न मानिये

ये शेर मिल गए थे सड़क पर पड़े हुए

कर गई घर मेरा खाली, मेरे सो जाने के बाद

पापुलर मेरठी साहब को सुनना हमेशा से एक बढ़िया अनुभव रहा है. लेकिन उन्हें पढ़ना? आप एक बार बढ़कर देखिये, क्या पता पढ़ना भी ठीक-ठाक अनुभव रहे....

कर गई घर मेरा खाली, मेरे सो जाने के बाद
मुझको धड़का था, कि कुछ होगा तेरे आने के बाद
मैंने दोनों बार थाने में लिखाई थी रपट
एक तेरे आने से पहले, एक तेरे जाने के बाद

या फिर;

रात को छम्मो के कोठे पर, पुलिस ने दी दबिश
मनचलों की भीड़ से, कैसा समां बनता गया
अपना कल्लन तो सयाना था, निकल भागा मगर
लोग साथ आते गए, और कारवाँ बनता गया

तुम भी क्या याद करोगे - चलो अब सर पीटो

इरफ़ान भाई शुक्रिया.

इतनी सस्ती जगह ले आए सस्ते में
वरना हम - पड़े थे कही रस्ते में .......
अब मियाँ बुला ही लिया है तो झेलो भी

तुम भी क्या याद करोगे - चलो अब सर पीटो.

याद नहीं आता किसका लिखा है मगर इस इंटरनेट के ज़माने में भी ये झेलेंगे ?

"निराली शान के या रब ! हमारे डाकखा़ने हैं
जो तार आया सो लेट आया, जो ख़त आया ग़लत आया
मेरे इक दोस्त ने लिखा था कि आता हूँ करांची में
वो आ कर चल दिए ... और छः महीने बाद ख़त आया"

Monday, 10 March 2008

चचा गालिब से प्रदीप चौबे जी की क्षमा याचना

पुरानी ग़ज़लों का चरबा करना और उनमें से अच्‍छी बाते निकाल लाना ये तो प्रदीप जी के ही बस का है तभी तो उन्‍होंने चचा गालिब को भी नहीं बक्‍शा है

डाक अब वक्‍त पर नहीं आती

दोस्‍तों की खबर नहीं आती

पहले आती थी चुटकुलों पे हंसी

अब किसी बात पर नहीं आती

हमने चाहा कि मौत आ जाए

मौत बोली कि 'मर' , नहीं आती

Sunday, 9 March 2008

दुल्हन वही

दुल्हन वही जो पिया मन भाए/

बीवी वही जो कमा कर लाए//

अब्बा बना गई

टूटे हुए दिल को मुरब्बा बना गई , घर को मेरे कचरे का डब्बा बना गई /

शादी को अभी तीन महीने भी नही गुजरे , ना जाने किस हिसाब से अब्बा बना गई /

Saturday, 8 March 2008

सस्ता शेर : THE MOST MALE DOMINATED BLOG TODAY?

दोस्तो बड़े तह्ज़ीबो -तमद्दुन से बैनुलक्वामी सतह पे' वीमंस - डे ' मनाया जा रया है मगर इस अहम् दिन का ये ढलता सूरज जो अनसुलझे सवालात छोडे जा रया है उनमे एक ये भी है के 'सस्ता शेर ' की दिनों दिन तरक्की के बावुजूद खावातीन की भागीदारी इसमे कभी नज़र नही आन पाई है । मैंने कल भी ये सवाल उठाने की गुस्ताखी की थी मगर लहजे की 'संसकिरती खनक ' हजरात को शायद रास न आई । बहरहाल पूरी शिद्दत से आज भी मैं वही सवाल उठाने की हिमाकत यहाँ कर रया हूँ के भई ' ये सस्ता शेर अमरीकनो की stag - party के मानिंद एक मेल- डोमेन क्यों बना है और एकाध मर्तबा की जाने दें तो कभी कोई ' ब्लोगेश वरी ' या कहें के 'ब्लॉग कन्या ' या के ब्लोगान्गना कभी क्यों इधर का रुख भूले से भी नहीं करतीं ? ये एक ऐसा सवाल है हजरात जिस से आज नहीं तो कल हमें जूझने की ज़ुरूरत पड़ेगी । सो अपने चाक गिरेबान में झाँक कर यहाँ मौजूद तमाम ब्लौगाधीश , ब्लूगिस्तान के नामचीन कमानदार अब बड़ी नेकनीयती और साफगोई से इज़हारे ख़याल करेंगे ऐसी उम्मीद हम कर रए हैं तो क्या ग़लत कर रए हैं?

Friday, 7 March 2008

.....और अब एक लम्पट प्रार्थना


हे ब्लौगेन्द्र -ब्लौगाधिपति मित्रवर इरफान !
अब ब्लौगान्ग्नाएँ बुलवाइए तो आये जान में जान !!

कितनी मासूम सी ग़जारिश है

कई बार खुदा से बड़ी मासूम सी गुजारिशें की जाती हैं और ये गुजारिशें होती भी ऐसी हैं कि वो भी बिचारा मुश्किल में पड़ जाता है कि अब क्‍या किया जाए

या खुदा निगाहे नाज़ पर लायसेन्‍स क्‍यों नहीं

ये भी तो कत्‍ल करती हैं बन्‍दूक की तरह

Thursday, 6 March 2008

हाय री !


कैसे लिखूं सेर और सायरी ,

सफर में खो गई मेरी डायरी।

हाय री !

बहुत खोजा यहां -वहां जाय री

पर फिर भी न मिली डायरी

हाय -हाय री !

अगर किसू कू मिलै तो प्लीज-प्लीज
मेरे पते पर दीजियो भिजवाय री

हाय-हाय री मेरी सेर- सायरी की डायरी!ई -ई

Wednesday, 5 March 2008

मुम्बई अंदर से सड़ेला है


राज ठाकरे वाले घटिया एपीसोड से पहले खामख्वाह हैदराबादी का शेर था-

ये मुम्बई शहर है हापूस का माफिक

बाहर से दिखे अच्छा, अन्दर से सड़ेला है।

और विजय सतनवी का शेर है-

हैजा की बात कर या एड्स की बात कर

मुम्बई में आजकल तो प्लेग पड़ेला है।

Monday, 3 March 2008

न ये ज़मीं के लिये है न आसमाँ के लिये

न ये ज़मीं के लिये है न आसमाँ के लिये

न ये मकीं के लिये है न मेहरबाँ के लिये

ये और बात, लपेटे में कोई आ जाए

बना है पोटा, तजम्मुल हुसेन ख़ाँ के लिये.

Sunday, 2 March 2008

साग़र खैय्यामी साहब फ़िर फ़रमाते हैं-

मंजन घिसा था जिनपे चमकने की आस में
रक्खे हुए हैं दांत वही अब गिलास में.

अभी मन ना है

हमारी भाषा अलग थी और शब्द जुदा लेकिन बात हम एक ही कर रहे थे, आप जिन्हें सस्ता शेर कह रहे थे उन्हें हमने जेनेरिक शेर नाम दिया हुआ था। एक शेर दूसरे शेर से कब तक जुदा रहता जिस दिन हमें वो दूसरा शेर नजर आया हमने हाथ मिलाने का निमंत्रण कुछ यूँ माँगा -

हमें भी इस सस्ती महफिल का सितारा बनना है
7 से ज्यादा शेर भेजते, लेकिन अभी मन ना है।


अब हम खुद तो हाथ भी नही लगाते लेकिन पिये और पीने वालों पर लिखने से परहेज बिल्कुल नही करते, ये बानगी देखिये -

नशे को कर बुलंद इतना कि हर पैग से पहले,
शराबी शराब से ये पूछे, बता तूझमें इतना मजा क्यों है।

अब देश में महिलाओं को कितनी आजादी है ये तो पता नही लेकिन टीवी सीरियलों में देखें तो बस वो ही वो हैं,

पति के बोलने के हम नही कायल,
जब सास-ससूर को नही बख्शा तो ये बहू क्या है।

और अपना लिटिल ड्रैगन अपने से भी दो हाथ आगे है, देखिये कैसे नयी चीज मांगता है -

नये कपड़े लेने का, मेरे बेटे ने, निराला ढंग निकाला है।
अपनी मम्मी से पूछता है, उसका पैजामा किसने फाड़ डाला है।

आज के लिये बस इतना ही।

Friday, 29 February 2008

नई बहस

ये नया शिगूफ़ा है गांव गांव ,
न बात चीत बस कांव कांव
मूंडी हिलाओ हां में सब ,
या फिर सुनो मेरी खांव खांव

अहवाल-ए-जीस्त : दूसरा संस्करण

हुए दस बरस, हम दोस्तो, हैं लगे हुए एक हॉल में
मुग़ल-ए-आज़म अब हमें रकीब सारे बताने लगे

(जो भी वर्ज़न ठीक लगे, वही पसंद करें। मेरे लिए यह एक बड़ी पुरानी थीम है। थैंक्यू साब लोग।)

अहवाल-ए-जीस्त

लगी पड़ी दस साल से है, एक ही टॉकीज़ में
ज़िन्दगी अपनी रफ़ीको, 'मुग़ल-ए-आज़म' हो गई.

वो बोली ''मैं रही रदीफ सी ज्‍यों की त्‍यों ''

मित्रों आपको कोई जवानी की प्रेमिका कभी अधेड़ावस्‍था में मिली है । हमें  मिली तो श्रीमती सरोज व्‍यास का शेर पेल गई । क्‍यों, दरअस्‍ल में वे तो वैसी की वैसी ही नजर आ रहीं थीं ( जय हो ब्‍यूटी पार्लर) जैसी हमें जवानी में मिलीं थीं मगर हम तो उस अवस्‍था का अंश भी नहीं बचे थे । और इसीलिये वो शेर कह गईं कि

ये है मौसमों का कोई असर, या ग़ज़ल का कोई निज़ाम है

मैं रही रदीफ़ सी ज्‍यूं की त्‍यूं, तुम्‍हीं काफि़ये से बदल गए

धरती तारे, पहाड़, पत्थर

मनीषा के आंसू मुझ से देखे ना गये ;) इसलिये कल जिन ३ शेरों का जिक्र उन्होंने किया वो उनकी तरफ से मानिये और उन ३ शेरों की कमी पूरी करने के लिये अपनी सस्ती डायरी के रद्दी के पन्नों से उतारे ये ३ शेर अर्ज है। हाँ, हाँ मुझे मालूम है ये कुछ ज्यादा ही सस्ते हैं लेकिन अभी अभी मुनीश ने मंहगाई मार गयी गाया था उसका असर थोड़ी देर तो रहेगा ना।

धरती तारे, पहाड़, पत्थर
धरती तारे, पहाड़, पत्थर
इकहत्तर, बहत्तर, चौहत्तर।
(तिहत्तर का मत सोचिये वो छुट्टी पर है)

जिसे दिल दिया वो दिल्ली चली गयी
जिसे प्यार किया वो इटली चली गयी।
दिल ने कहा, खुदकुशी कर ले जालिम
बिजली को हाथ लगाया तो बिजली चली गयी।

दिल को पता था वो जरूर आयेगी
दिल को पता था वो जरूर आयेगी
पर कभी सोचा ना था जब आयेगी
अपना बॉयफ्रैंड^ भी साथ लायेगी।

^हसबैंड भी पढ़ सकते हैं।

Thursday, 28 February 2008

शायर में भभकती फायर : विचार माला --१

"साहित्यिक अभिरुचि वालों का हाथ गणित मे अक्स़र तंग देखा गया है और इसीलिए मोल-भाव या 'बारगेनिंग' में वो कच्चे होते हैं " -अपने निजी अनुभव के आधार पर जब मैंने ये बात उस रोज़ अशोक पांडे से कही तो आपने एक वाकया बयां किया जो मेरी अवधारणा को और मज़बूत करता है । आज तो खैर देश भर में इम्पोर्टेड चीनी समान मिलता है ,पहले पहाडी जगहों पे या आस-पास ही मिलता रहा है । पांडे जी ने बताया की एक दफे कुछ नेपाली चीन में बने 'मिंक blanket' लेकर उनके यहाँ आए , उन्हें वो बहुत अच्छे लगे हालांकि दाम बहुत ज़ियादा--४४०० रुपये थे । फ़िर भी वो दाम चुकाने को राज़ी हो गए चूँकि ऐसा कोई सामान उन्होंने यहाँ के बाज़ार में देखा न था सो तुलना भी क्या करते ! लेकिन माता जी ने उन्हें रोका और कहा की वो कंबलों के सिर्फ़ ८०० रुपये देंगी , ये सुन कर भाव धम्म से सीधा २००० पर आ गया और अंततोगत्वा १२०० रुपैय्ये में वो नेपाली सहर्ष कम्बल बेच कर गए ! इस प्रकार के अनुभव मुझे भी अक्स़र हुए हैं मगर फिर भी मोल भाव में अक्स़र मात खाता रहा हूँ । इन दिनों बजट का मौसम है और 'सस्ते शेर' की punch line कहती है 'महंगाई के दौर में राहत की साँस ' सो इसीलिए अशोक भाई के कम्बल को संबल मान कर हाले दिल बयान कर बैठा । ऐसे में फ़िल्म 'रोटी कपडा और मकां' की एक क़व्वाली के ये अल्फाज़ याद आते हैं :
' एक हमें आँख की लड़ाई मार गयी ;
दूसरी हमेशा की तन्हाई मार गई ;
सोच सोच में जो सोच आई मार गई ;
चौथी ये खुदा की खुदाई मार गई ;
और बाक़ी कुछ बचा तो महंगाई मार गई ...
महंगाई मार गई .......

दोस्तों शायर शायरी करता है और सस्ती महंगी जैसी बन पड़ेगी वो करेगा ! लेकिन सस्ते शेर पे अब कुछ ऐसी बातें भी शेयर करने का वक़्त क्या नहीं आ गया है की जिस से शायर को ये भी पता चलता रहे के बढ़िया समान सस्ते दामों पर कहाँ से खरीदा जा सकता है ,मसलन मुझे फिल्मों की डीवीडी खरीदने का एक व्यसन सा था और मैं दिल्ली के पालिका बाज़ार से १०० रुपैय्ये की पायरेटेड डीवीडी खरीद कर भी इसलिए खुश होता था की उनकी quality बढ़िया थी और ४०० रुपैय्ये की ओरिजनल खरीदने की मेरी हैसियत न थी । उस रोज़ जब एक आवारा लड़के ने मुझे पुरानी दिल्ली की लाजपत राय मार्केट जाने की सलाह दी तो सहसा यकीन न हुआ मगर जब जाकर देखा तो पैरों तले की ज़मीन कद्दावर पहाड़ में तब्दील हो गई चूँकि वहां झक्कास quality की GODFATHER-the triology मात्र ३० भारतीय रुपिय्ये में मिल रही थी ! खुशी से ज्यादा मुझे अफ़सोस हुआ इस बात का की मैंने कितनी कमाई,जो कतई हराम की न थी , यूं ही जानकारी के अभाव में उड़ा दी । हो सकता है विदेशों में बैठे ब्लागरों को मेरी इन बातों से कोई सरोकार महसूस न हो मगर वो हर हिंदुस्तानी ब्लोगिया जिसे अपनी गाढी कमाई
से ही साहित्य, सिनेमा , आशिकी और सैरे -गुलशन के मजे लूटने हैं और भात रान्ध्ते हुए सस्ते शेर भी कहने हैं कम से कम वो यहाँ अपने ऐसे अनुभव हमसे ज़रुर बांटेगा की जिस से 'महंगाई के दौर में राहत की साँस' वाली बात सही साबित हो --ऐसी मेरी बिस्वास है !

तरदामनी पर शेख हमारी न जाइए

बहुत सालों के बाद पिछले दिनों पत्रकार मित्र श्रीप्रकाश टकरा गए दिल्ली में। उन की मारफ़त एक जबरजस्त सेर आया है। सो पहला शुक्रिया उन का। एक शुक्रिया उन साहेब के वास्ते ड्यू है जो इस महान कविता के मूल रचनाकार का नाम-पता मुहैय्या कराएगा।

तरदामनी पर शेख़ हमारी न जाइयो
दामन निचोड़ दें तो फ़रिश्ते वज़ू करें

इधर खुदा है, उधर खुदा है

सस्ते शेरों की इस महफिल में निठल्ले का सलाम, अब ज्यादा दुआ सलाम ना करते हुए सीधे अर्ज किया है -

तुम्हारा चेहरा मोती समान, तुम्हारा चेहरा मोती समान
मोती हमारे कुत्ते का नाम।

इधर खुदा है, उधर खुदा है, जिधर देखो उधर खुदा है
इधर-उधर बस खुदा ही खुदा है,
जिधर नही खुदा है, उधर कल खुदेगा।

तुमको देखा, तुमको देखा तो ये ख्याल आया
पागलों के स्टॉक में एक नया माल आया।

तू मेरे दिल में ऐसे समायी है
जैसे बाजरे के खेत में भैंस घुस आयी है।
साग़र खय्यामी साहब फ़रमाते हैं-

सर पे चुपड़ के तेल वो बे-बाल हो गयीं
दो ही मिनट में सोणी से महिवाल हो गयीं.

बन्दे मातरम:भाग दो

कल आपने राष्ट्रभाषा पर फ़िराक़ गोरखपुरी साहब की लम्बी कविता 'बन्दे मातरम' के दो टुकड़े पढ़े थे। एक और हिस्सा देखिए:

अब जिगर थाम के बैठो मेरी बारी आई

क्या हम को समझ रखा है तुमने हम कांग्रेसिये लीडर हैं
हो भैंस चराने की न लियाक़त, पार्लिमेंट के मेम्बर हैं
हम नरक बना दें भारत को, यानी हम लोग मिनिस्टर हैं
मालिक हैं सफ़ेद-ओ-सियाह के हम, हम हिन्दुस्तां के मुकद्दर हैं
भारत की दुखती छाती पर भारी से भारी पत्थर हैं
- बन्दे मातरम

हम गांधियत के नख़रे, गांधियत के नाज़-ए-बेज़ा हैं
जनता को पयामे-ए-मर्ग हैं हम, भारत के गले का फ़न्दा हैं
हम हिन्द की मिटी उमीदें हैं, जम्हूर का ख़ून-ए-तमन्ना हैं
हैं सत्य अहिंसा की मूरत क्या तुमको बताएं हम क्या हैं
सब लोग हमारी जय बोलें, हम राजा हैं, हम परजा हैं
-बन्दे मातरम

Wednesday, 27 February 2008

बन्दे मातरम : भाग एक

फ़िराक़ साहब ने किसी ज़माने में भारत की सांस्कृतिक और राजनैतिक दरिद्रता, खोखली देशभक्ति और भाषाप्रेम के साथ साथ अफ़सरशाही पर तंज़ कसते हुए एक लम्बी कविता लिखी थी 'बन्दे मातरम'। सस्ते शेरों की महफ़िल में क्यूं न उसके कुछ हिस्से पेश किए जाएं। यह रही पहली किस्त:

राष्ट्र भाषा

सब जुमले टेढ़े मेढ़े हैं अलफ़ाज़ भी हैं रोड़े पत्थर
और इस पर तुर्रा यह है कि हम मीर-ओ-ग़ालिब से हैं बढ़कर
हम नाक काट लें 'सादी' की हम शेक्सपीयर के हैं हमसर
यह अहले-अदब ये अहले-क़लम किस बोली के हैं छूमन्तर
ये क़ौमी ज़बां के मोजिद हैं साहित्यरत्न, विद्यासागर
-बन्दे मातरम

सुनने वालों के होश उड़ें वह पढ़ के मारते अन्छर हैं
जो मुंह में आए बोल जाएं, शब्दों के यहां दलिद्दर हैं
इस ऊबड़ खाबड़ बोली में, वो झक्कड़ और बवंडर हैं
मतलब ही जड़ से उखड़ जाए वो चलते हुए चलित्तर हैं
हम 'हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान' लिख लोढ़ा हैं पढ़ पत्थर हैं
-बन्दे मातरम

Tuesday, 26 February 2008

लौंडा फ़क़ीर का: भाग दो

जब रागिनी सुने है तो ख़िफ़्फ़त* मिटाने को
सर बार - बार मोड़े है सिगरेट जलाने को
गरदन को भी हिलाए है उल्लू बनाने को
मैं राग जानता हूं फ़क़त यह जताने को
रह रह के मुस्कराए है लौंडा फ़क़ीर का

लिक्खा पढ़ा तो ख़ैर कुछ भी नहीं मगर
उलझा के डाल देता है अख़बार इधर उधर
जाहिल है और इल्म का रखता है कर्रो-फ़र*
रंगीन मोटी मोटी किताबें ख़रीद कर
शोकेस में जमाए है लौंडा फ़क़ीर का

मैदान में वो ठहरेंगे जो सूर बीर हैं
वो क्या धनी बनेंगे जो दिल के फ़क़ीर हैं
इस जग में पोतड़ों* के जो यारो अमीर हैं
गम्भीरता लिए हुए जिनके ख़मीर* हैं
मुफ़्त उनकी धज उड़ाए है लौंडा फ़क़ीर का

गर हम कहें कि आज तो राजा हो जमघटा
हो नाच रंग, धूम धड़क्का अहा अहा
तो एक हीजड़ा भी न बुलवाए बेहया
पर एक इशारा पाते ही बस कोतवाल का
सौ रंडियां नचाए है लौंडा फ़क़ीर का

(*ख़िफ़्फ़त: झेंप, कर्रो-फ़र: शान, पोतड़ा: पुश्तैनी अमीर )

Saturday, 23 February 2008

वल्लाह निकालते हैं यों दिल की भड़ास उर्फ़ राजरिशी की आमद

'फ़िराक़' गोरखपुरी की लम्बी नज़्म 'माज़ी परस्त' से तीन टुकड़े:

कलचर की अहमियत को समझाते हैं
क्या फूल हिमाक़त के वो बरसाते हैं
दरशन हुए जाते हैं अभी भक्तों को
सोटा लिए वो राजरिशी आते हैं

झटकाते हैं कांधे अड़बड़ा जाते हैं
ऐसे मौकों पै हड़बड़ा जाते हैं
सुलझाने को कहिए कोई उलझी हुई बात
तो राजरिशी जी गड़बड़ा जाते हैं

वल्लाह निकालते हैं यों दिल की भड़ास
सब राजरिशी से बांधे बैठे थे आस
भूखों प्यासों को आज वक़्ते-तक़रीर
वो डांट पिलाई न रही न रही भूख न प्यास

(माज़ी परस्त: अतीत का पुजारी, राजरिशी: राजर्षि, वक़्ते-तक़रीर: भाषण के समय)

Friday, 22 February 2008

लौंडा फ़क़ीर का

बाबा नज़ीर अकबराबादी की ज़मीन पर शायर-ए-वतन जोश मलीहाबादी साहब ने एक कविता लिखी थी: "धन राजा का जो पाए है लौंडा फ़क़ीर का". बेदख़ल मनीषा पांडे को नज़्र है उसी से एक टुकड़ा और साथ में ये दोस्ताना सलाह भी कि 'डोन्ट यू वरी'.

असली अमीर हूं ये दिखाने के वास्ते

पुरखों की गन्दगी को छिपाने के वास्ते

जो बू बसी है उसको दबाने के वास्ते

माता-पिता का मैल छिपाने के वास्ते

दो दो पहर नहाए है लौंडा फ़क़ीर का

धन राजा का जो पाए है लौंडा फ़क़ीर का

क्या क्या ठसक दिखाए है लौंडा फ़क़ीर का

नदिरे-पुदिरे और आगरे

लोकप्रिय टीवी कॉमेडी शो ऑफ़िस-ऑफिस से अपनी अलग पहचान बनानेवाले हेमंत पांडे की एक सस्ती कविता पेश है.

क्‍या आप कभी चने के झाड़ पर चढ़े हैं नहीं, तो चढ़ कर देखें

चने के झाड़ पर चढाने के अर्थ होता है झूठी प्रशंसा और चापलूसी करके किसीको फुला देना और कोई भी काम करवा लेना, और बाद में उसके मजे भी लेना .
आज कल चने के झाड़ पर चढ़ाने का बड़ा फैशन है । हर कोई एक दूसरे को चने के झाड़ पर चढ़ा रहा है और उसके बाद जो हालत चने के झाड़ पर चढ़ने वाले की होती है वो तो ऊपर वाला ही जानता है । ब्‍लागिंग में भी आजकल चने के झाड़ पर चढ़ाने का खेल खूब चल रहा है तू मुझे चढ़ा मैं तुझे चढ़ाऊं वाली स्‍टाइल में । मेरे एक मित्र हुआ करते थे मिर्जा इछावरी उन्‍होंने ''खुदी को कर बुलंद इतना के हर तकदीर से पहले खुदा बन्‍दे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्‍या है '' का चरबा करके चने के झाड़ पर ये शेर निकाला था शेर में एक शब्‍द उन्‍होंने अपनी फितरत के हिसाब से असंसदीय लिया था हालंकि वो शब्‍द शेर की जान है पर मैं उसे नहीं दे पा रहा हूं केवल प्रतीक से काम ले रहा हूं ।
चढ़ा दो झाड़ पर उसको चने के और फिर पूछो
बता तो #### के तू भला उतरेगा अब कैसे

हालंकि शेर बहर से बाहर बनाया है पर मिर्जा काथा कि जो हमने लिखा वो ही व्‍याकरण है अब मिर्जा के इतने भी बुरे दिन नहीं आए हैं कि हजार साल पुरानी व्‍याकरण पर शेर क कहना हें ।

पतनशील होने से पहले की मासूम यादें!!


सन ८० की दहाई के किसी साल फिलिम director जनाब परकाश मैहरा की एक तस्वीर 'शराबी' देखी थी जिसमे इश्तेहारी दुनिया और सनीमे की मशहूर हस्ती अमीताभ बचन साहब ने एक ख़ाली गिलास कांच का अपने फौलादी पंजे में थामा हुआ है और अपनी ही रौ में बुदबुदाते हैं ,मगर कुछ इस तरेह के दूसरे हज़रात भी सुन सकें , आप फरमाते हैं : ''अब तो उतनी भी मयस्सर नहीं मैखाने में

जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में "
उनका ये कहना सनीमा हॉल में मौजूद उन खावातीनो -हज्रात को भी उदासी के समंदर में धकेल देता है जिन्होंने कभी मय चक्खी तो दूर जनाब सूँघी तक नहीं है ! आज वही शेर जब जनाब विजे शंकर ने यहाँ पेश किया तो पुरानी यादें ताज़ा हो आयीं । वैसे ये शेर किसी मशहूर शाइर का मालूम देता है , अगरचे किसी दानिश्मंद को मालूम हो तो यहाँ इत्तिला देके ओल्ड मंक का एक पव्वा हमसे कुबूल फरमाएं .

Thursday, 21 February 2008

गुजिश्ता पखवाड़े भर से नुक्कड़ के मैखाने में बलानोशी फरमा रहा था. दिमाग़ उड़नखटोला हो रहा है.इसी हालत में एक शेर पकड़ लाया हूँ- इसे 'सस्ता शेर' में अब तक बोतलों की फोटुएँ दिखा-दिखा कर दारू से तर शेरों के एक्शन का रिएक्शन समझा जाए- अलबत्ता ये शेर कहने वाला अब भी मैखाने के मैनेजर से बहस फंसाये हुए है-

शहंशाह-ए-शेर है कि-

अब तो उतनी भी नहीं मिलती है तेरे मैखाने में

जितनी हम कभी छोड़ दिया करते थे पैमाने में.
हैरी बैलाफ़ोन्टे से सस्ते यार परिचित हैं ही। रम और अन्य तरल-गरल पदार्थों के मर्म को समझने वालों की खि़दमत में लीजिए आज उनका एक शानदार गीत।

Will his love be like his rum,
Yes it will, yes it will,
Intoxicating all night long,
Yes it will, yes it will,

everybody,Drink, drink this toast,
Drink this wedding toast,Drink oh drink this toast,
To the two we love the most,
Did he wed her in the spring,

Yes he did, yes he did,
Did he give her finger ring,
Yes he did, yes he did,
Will her cooking be the best,
Yes it will, yes it will,

Make his belly split his best,
Yes it will, yes it will,
Will she be a perfect wife,
Yes she will, yes she will,

Make him work hard all his life,
Yes she will, yes she will,
Will we dance and sing all night-a,
Yes we will, yes we will,
Eat up evrything inside,
Yes we will, yes we will

मैं और मेरी 'कवीता ' !

यह मेरा कलुषित काव्यकर्म जो आज गर्हित और त्याज्य है/
कल कू ये एक 'वाद' बने ये भी सहज संभाव्य है.!!

इत्यलम अर्थात इत्ता ही भोत है !

चप्पल के बाद अब कीचड़ की बारी

भाई मुनीश के लिए एक पूर्ण पतित कॉमिक आमन्त्रण:
भेज रहा हूं पतन निमन्त्रण, प्यारे तुम्हें पटाने को
ये कीचड़ के महाग्रास, तुम भूल न जाना खाने को.

Tuesday, 19 February 2008

चलिये आज कुछ चप्‍पलें खाने की बात करें आपने खाईं हैं कि नहीं पर इन्‍होंने तो खार्इं हैं नहीं तो खुद ही देख लें

चप्‍पलें खाना भी एक प्रकार का पुण्‍य का ही काम हैं क्‍योंकि वो प्रमिका के पैरों की चप्‍पलें होती हैं जिसके पैरों के नीचे आपके आने वाले बच्‍चों की जन्‍नतें हो सकती हैं अगर आपने आज चप्‍पलें खालीं तो । ये महाशय भी चप्‍पलें ही खा रहे हैं
आशिकी में चप्‍पलें खाने का भी इक पुण्‍य है
जो मज़ा उसमें है मिलता वो मज़ा तो दिव्‍य है
हाय चप्‍पल वो सनम की जो भिड़ीं गोबर में थीं
स्‍वाद के आगे पिटाई का गुनह भी क्षम्‍य है



Monday, 18 February 2008

हम तो आलरेडी पतन शील हैं !

सस्ते शेर का ही एक वो 'सेन्सेक्स' है हाज़रीन जो बलंदियों को छूने की बजाये हमेशा नीचे ही नीचे को चलता है !वाजेह रहे कि हरदिल अज़ीज़ शख्सियत के धनी और ब्लोग्गिंग की दुनिया के जगमग तारे इरफान ने इस ब्लॉग को तश्कील देते वक़्त ये हलफ उठाया था के ,चूँकि गहराई मापने के लिए नीचे उतरना पड़ता है सो शायरी को भी जितना नीचे गिराया जा सकता है उतना गिराने का मौक़ा वो हर ख़ास ओ आम को फराहम करायेंगे । उनकी इसी नेकनीयती की बदौलत शायरी का ये ट्रक बड़े तह्ज़ीबो -तमद्दुन से हिकारत का ये सफर तै कर रहा है और करता रहेगा ये बात पूरे यकीन से कही जा सकती है । बड़े बड़े खज़ाने और राज़ गहराइयों में ही पोशीदा हैं , बलंदियों पे क्या रखा है वहां तो
ओक्सीज़ंन तक के टोटे पड़ जाते हैं साहब!! सो पतन शीलता के इस कारवां को यूं ही आगे बढाना जारी रखना है ,फतह हमारी ही होगी । आज कई खवातीन और साहेबान फरमा रहे हैं की वो 'पतनशील' होने के खाहिश्मंद हैं , की अब उनसे रहा नहीं जाता । अल्लाह उन्हें कामयाबी दे , हम तो पहले ही पतनशील हैं । जय सस्तापन! जय बोर्ची !

तेरे इंतजार में मेरे प्यारे

फरवरी का महीना घुमक्कड़ी के नाम पे लिख गया है.
इस बीच ढेर सारा साहित्य ट्रकों के पीछे दिख गया है.
भाइयों और भैनों!मैं एक छोटे से गाम का कबाड़ी दिल्ली में किताबॉं का मेला देखने गया था .मेला भी खूब देखा और झेला भी खूब. एक ट्रक के पीछे दिक्खा एक शेर भौत बोफ्फाइन लगा मिजको . उसको हियां पै पेश कर रिया हूं.भाई लोग बुरा ना मान जाएं इसलिए डर भी रिया हूं.चलो जी एडवांस में माफी-'खेर', लो जी 'सेर' -अब काहे की देर-
बागों में मोरनी पूछे , चौराहे पर पूछे सिपाही
बोम्बे में एसवरिया पूछे ७९११ क्यों नहीं आई.

Thursday, 14 February 2008

श्रध्दा भरा अध्धा !!


कुछ थे कुछ हैं और कुछ ब्लॉगर अभी होंगे महान

इस खुशी में क्यूं न यारों कर लेवें थोड़ा मद्यपान!!