
तड़पना है तो जाओ जा के तड़पो "शाद" खि़लवत में .....
"शाद" साहब नाशाद न होइयेगा, अब आगे माफ़ करियेगा
तड़पना है तो जाओ दारु मारो जा के ठेके में
वहाँ छक के पियो ओर फ़ोन पर कह दो "तड़पते हैं"
महंगाई के दौर में एक राहत की सांस
प्रदीप चौबे जी की ग़ज़ल को खूब पसंद किया गया और किया भी क्यों न जाए है भी तो वैसी ही शख्सीयत । आज सुनिये डॉ महेंद्र अग्रवाल जी की एक गज़ल़ के कुछ शेर
अदबी अदब के वास्ते जिद पर अड़े हुए
चप्पल हवा में उड़ गई जूते खड़े हुए
माइक पकड़ के हो गए शायर अवाम के
आंधी के आम बीन जो लाए झड़े हुए
अदबी तो मानिये मुझे शायर न मानिये
ये शेर मिल गए थे सड़क पर पड़े हुए
पुरानी ग़ज़लों का चरबा करना और उनमें से अच्छी बाते निकाल लाना ये तो प्रदीप जी के ही बस का है तभी तो उन्होंने चचा गालिब को भी नहीं बक्शा है
डाक अब वक्त पर नहीं आती
दोस्तों की खबर नहीं आती
पहले आती थी चुटकुलों पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती
हमने चाहा कि मौत आ जाए
मौत बोली कि 'मर' , नहीं आती
टूटे हुए दिल को मुरब्बा बना गई , घर को मेरे कचरे का डब्बा बना गई /
शादी को अभी तीन महीने भी नही गुजरे , ना जाने किस हिसाब से अब्बा बना गई /
कई बार खुदा से बड़ी मासूम सी गुजारिशें की जाती हैं और ये गुजारिशें होती भी ऐसी हैं कि वो भी बिचारा मुश्किल में पड़ जाता है कि अब क्या किया जाए
या खुदा निगाहे नाज़ पर लायसेन्स क्यों नहीं
ये भी तो कत्ल करती हैं बन्दूक की तरह
मित्रों आपको कोई जवानी की प्रेमिका कभी अधेड़ावस्था में मिली है । हमें मिली तो श्रीमती सरोज व्यास का शेर पेल गई । क्यों, दरअस्ल में वे तो वैसी की वैसी ही नजर आ रहीं थीं ( जय हो ब्यूटी पार्लर) जैसी हमें जवानी में मिलीं थीं मगर हम तो उस अवस्था का अंश भी नहीं बचे थे । और इसीलिये वो शेर कह गईं कि
ये है मौसमों का कोई असर, या ग़ज़ल का कोई निज़ाम है
मैं रही रदीफ़ सी ज्यूं की त्यूं, तुम्हीं काफि़ये से बदल गए
बाबा नज़ीर अकबराबादी की ज़मीन पर शायर-ए-वतन जोश मलीहाबादी साहब ने एक कविता लिखी थी: "धन राजा का जो पाए है लौंडा फ़क़ीर का". बेदख़ल मनीषा पांडे को नज़्र है उसी से एक टुकड़ा और साथ में ये दोस्ताना सलाह भी कि 'डोन्ट यू वरी'.
असली अमीर हूं ये दिखाने के वास्ते
पुरखों की गन्दगी को छिपाने के वास्ते
जो बू बसी है उसको दबाने के वास्ते
माता-पिता का मैल छिपाने के वास्ते
दो दो पहर नहाए है लौंडा फ़क़ीर का
धन राजा का जो पाए है लौंडा फ़क़ीर का
क्या क्या ठसक दिखाए है लौंडा फ़क़ीर का
चढ़ा दो झाड़ पर उसको चने के और फिर पूछो
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