मरहूम साहिर लुधियानवी और गुरुदत्त से दण्डवत क्षमायाचना के साथ
मैं धूल फ़ांक रहा हूं तुम्हारे कूचे में
तुम्हारी टांग मरम्मत से दुखती जाती है
न जाने आज तेरा बाप क्या करने वाला है
सुबह से टुन्न हूं लालटेन बुझती जाती है
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Tuesday, 8 July 2008
Sunday, 11 May 2008
एक पव्वा रम तो है, हरगाम हमन अफ़ोर्ड
एक पव्वा रम तो है, हरगाम हमन अफ़ोर्ड
पैसे की काहे फिर तुमन दिखलाओ हो तड़ी
पैसे की काहे फिर तुमन दिखलाओ हो तड़ी
Monday, 28 April 2008
Wednesday, 16 April 2008
कभी मुंह तो ला मेरी नांद में
जनाब बशीर बद्र से एक बार और क्षमायाचना के साथ उनकी पौन बीघा ज़मीन पर एक सस्ता वाला:
कभी मुंह तो ला मेरी नांद में, कि तेरी अकल पे बजर गिरे
मुझे कुछ रकम तो उधार दे, फिर अपना चेहरा तू धो न धो
Tuesday, 25 March 2008
एक सस्त : मौकापरस्त
बिरादर सस्ते गौर फरमाएं, मौसम की सदाएं :
पटखनी दे के छुड़ा देते छक्के अच्छे अच्छों के
बस ज़रा इम्तिहान तो हो जाएं घर के बच्चों के
पटखनी दे के छुड़ा देते छक्के अच्छे अच्छों के
बस ज़रा इम्तिहान तो हो जाएं घर के बच्चों के
Friday, 29 February 2008
नई बहस
ये नया शिगूफ़ा है गांव गांव ,
न बात चीत बस कांव कांव
मूंडी हिलाओ हां में सब ,
या फिर सुनो मेरी खांव खांव
न बात चीत बस कांव कांव
मूंडी हिलाओ हां में सब ,
या फिर सुनो मेरी खांव खांव
अहवाल-ए-जीस्त : दूसरा संस्करण
हुए दस बरस, हम दोस्तो, हैं लगे हुए एक हॉल में
मुग़ल-ए-आज़म अब हमें रकीब सारे बताने लगे
(जो भी वर्ज़न ठीक लगे, वही पसंद करें। मेरे लिए यह एक बड़ी पुरानी थीम है। थैंक्यू साब लोग।)
मुग़ल-ए-आज़म अब हमें रकीब सारे बताने लगे
(जो भी वर्ज़न ठीक लगे, वही पसंद करें। मेरे लिए यह एक बड़ी पुरानी थीम है। थैंक्यू साब लोग।)
Saturday, 2 February 2008
दिल की चूल हिली देखी तो
दिल की चूल हिली देखी तो हमने तेरा नाम लिया
दफ़न कबर में करने की भी उन ने रस्म बनाई क्या
(मरहूम दोस्त और अजीमुश्शान शायर हरजीत से माफ़ी सहित)
दफ़न कबर में करने की भी उन ने रस्म बनाई क्या
(मरहूम दोस्त और अजीमुश्शान शायर हरजीत से माफ़ी सहित)
ठंड की वजह से जाड़ा हुआ
ठंड की वजह से जाड़ा हुआ
जो सीधा खड़ा था वो आड़ा हुआ
इफ़्फ़न 'घुर्मामारकुण्डवी' को देखो
पजामा बने था, सो नाड़ा हुआ
जो सीधा खड़ा था वो आड़ा हुआ
इफ़्फ़न 'घुर्मामारकुण्डवी' को देखो
पजामा बने था, सो नाड़ा हुआ
Friday, 1 February 2008
'सस्ता शेर' पर एक अखबार में लगी न्यूज़: मुनीश के हवाले से
दस बन्दों को ड्रिप चढ़ी, तीन जने हलाक़ हुए
"शायरिंग ऐसी हुई" - एक रिसाला लिखता है
"शायरिंग ऐसी हुई" - एक रिसाला लिखता है
Thursday, 31 January 2008
देश के भोंदू वीरों के लिए क़सीदा
नाटक देखा, डांट भी खाई, थोड़ा हुए अधीर,
बीवी घर से भाग गई, धनुष मिला ना तीर
एक रुपे का कद्दू खाया, तीन रुपे की खीर
खीस निपोरी, सड़क पे थूका, ऐसे भोंदू वीर
बीवी घर से भाग गई, धनुष मिला ना तीर
एक रुपे का कद्दू खाया, तीन रुपे की खीर
खीस निपोरी, सड़क पे थूका, ऐसे भोंदू वीर
मुर्मू मांझी के बाद अब इफ़्फ़न 'घुर्मामारकुण्डवी'
यार उरियां हो गए, जो उरियां किया बिलाग पे
फ़ोन का इक बिल अज़ीज़ो, इफ़्फ़न 'घुर्मामारकुण्डवी' ने
(यह एतिहासिक सेर और इफ़्फ़न 'घुर्मामारकुण्डवी' नामक सायर उस पोस्ट के बाद अस्तित्व में आए जिसे टूटी में कुछ रोज़ पहले लगाया गया था.)
फ़ोन का इक बिल अज़ीज़ो, इफ़्फ़न 'घुर्मामारकुण्डवी' ने
(यह एतिहासिक सेर और इफ़्फ़न 'घुर्मामारकुण्डवी' नामक सायर उस पोस्ट के बाद अस्तित्व में आए जिसे टूटी में कुछ रोज़ पहले लगाया गया था.)
Sunday, 23 December 2007
इस दफ़ा जनाब बशीर बद्र से माफ़ी मांगते हुए
कोई पान भी न खिलाएगा, जो पडे़ मिलोगे उधार में
ये नई दुकां है खुली यहां, कभी कैश पैसे दिया करो
ये नई दुकां है खुली यहां, कभी कैश पैसे दिया करो
Thursday, 20 December 2007
बाग़ीचा-ए-अल्ताफ़
बाग़ीचा-ए-अल्ताफ़* में कुटिया मेरे आगे
धोता है हरेक वक़्त वो पजामा मेरे आगे
(बाग़ीचा-ए-अल्ताफ़: अल्ताफ़ भाई का कालाढूंगी स्थित आम का विख्यात बग़ीचा जहां अब आम नहीं उगते. उस बग़ीचे में अब शंकर की झोपड़ी है. शंकर कालाढूंगी का एक स्ट्रग्लर धोबी है. यह पूरी सूचना सत्य है. उपरिलिखित शेर इसी सूचना पर आधारित है.)
धोता है हरेक वक़्त वो पजामा मेरे आगे
(बाग़ीचा-ए-अल्ताफ़: अल्ताफ़ भाई का कालाढूंगी स्थित आम का विख्यात बग़ीचा जहां अब आम नहीं उगते. उस बग़ीचे में अब शंकर की झोपड़ी है. शंकर कालाढूंगी का एक स्ट्रग्लर धोबी है. यह पूरी सूचना सत्य है. उपरिलिखित शेर इसी सूचना पर आधारित है.)
Thursday, 13 December 2007
रामाधीन भीखमखेडवी उर्फ़ कल्लोपरी का सबसे पुराना आसिक

'राग दरबारी' जिसने नहीं जानी, वो इसे न देखे
श्रीलाल शुक्ल जी के कालजयी उपन्यास 'राग दरबारी' के एक अविस्मरणीय चरित्र रामाधीन भीखमखेडवी की आत्मा ने कल शहर हल्द्वानी के डहरिया गांव में अपना शेर पूरा किया (परम आदरणीय श्रीलाल शुक्ल जी माफ़ कर देंगे इस शरारत पर)। प्रस्तुत है रामाधीन भीखमखेडवी का चौपाया:
रात को रोशन तू कर और चन्द्रमा सियाह बना
रात होते ही वो दरवाज़ों को सारे भेड जाती हैं
मुझे भी कभू नसीब हो वस्ल महज़बीनों का
कलूटी लडकियां हर शाम मुझको छेड जाती हैं
श्रीलाल शुक्ल जी के कालजयी उपन्यास 'राग दरबारी' के एक अविस्मरणीय चरित्र रामाधीन भीखमखेडवी की आत्मा ने कल शहर हल्द्वानी के डहरिया गांव में अपना शेर पूरा किया (परम आदरणीय श्रीलाल शुक्ल जी माफ़ कर देंगे इस शरारत पर)। प्रस्तुत है रामाधीन भीखमखेडवी का चौपाया:
रात को रोशन तू कर और चन्द्रमा सियाह बना
रात होते ही वो दरवाज़ों को सारे भेड जाती हैं
मुझे भी कभू नसीब हो वस्ल महज़बीनों का
कलूटी लडकियां हर शाम मुझको छेड जाती हैं
Wednesday, 21 November 2007
पी के का जीवन और सारे सस्ते शायरों को खुला निमंत्रण
मय्यत में गया पी के, शादी में गया पी के
दिल्ली गया तो पी के, घर लौट पहुँचा पी के
हुआ पोपुलर वो पी के, था नाम उस का पी के
पी के की वजह लोगो, यारों की बढ़ी जी के
उस पी के नाम शख्स का कल पढ़ के फ़ातेहा
हम घर की रहगुज़र थे कि घटा एक सानेहा
इक भूत मिला हाथ में पव्वा लिए कहता
कुछ भात दो और कुछ दो मुझे छोले कढ़ी पी के
(समस्त सस्ते शायर भाइयों से अपील है कि इन दो छंदों में मीटर की कमियाँ दूर करें और अपनी तरफ से कम-अज-कम एक एक छंद अवश्य जोडें। पी के भाई के जीवन की कहीं तो कोई कथा रेकार्ड हो जावे। जय बोर्ची! जय सस्तापन!!)
दिल्ली गया तो पी के, घर लौट पहुँचा पी के
हुआ पोपुलर वो पी के, था नाम उस का पी के
पी के की वजह लोगो, यारों की बढ़ी जी के
उस पी के नाम शख्स का कल पढ़ के फ़ातेहा
हम घर की रहगुज़र थे कि घटा एक सानेहा
इक भूत मिला हाथ में पव्वा लिए कहता
कुछ भात दो और कुछ दो मुझे छोले कढ़ी पी के
(समस्त सस्ते शायर भाइयों से अपील है कि इन दो छंदों में मीटर की कमियाँ दूर करें और अपनी तरफ से कम-अज-कम एक एक छंद अवश्य जोडें। पी के भाई के जीवन की कहीं तो कोई कथा रेकार्ड हो जावे। जय बोर्ची! जय सस्तापन!!)
Monday, 19 November 2007
Sunday, 4 November 2007
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