Sunday, 30 December 2007

सस्ती महफ़िल में एक चेन्ज के वास्ते

आज कुछ और पढ़वाया जाए भाई लोगों को. शुन्तारो तानीकावा जापानी शायर हैं. उन्हीं की चार लैना:

खाली पेट एक बच्चा उदास था क्योंकि खाली था उस का पेट
भरे पेट वाला एक राजा उदास था क्योंकि भरा हुआ था उस का पेट
बच्चे ने हवा की आवाज़ सुनी, राजा ने संगीत सुना
दोनों की आंखों में आए आंसू, यहां - इसी नक्षत्र पर।

mujhe daad na dene valo ke naam...

YE GUL O' NAGMA SHAAYRI, MERE GEET MAST AUR GHAZAL,
BADE LOGON KI BAATEIN HAIN, NAHI BACHCHON KE YE SHAGAL

Wednesday, 26 December 2007

nostalgia

yaad un shamo ki ab bhi basi hai meri nason mein,
vo le ke pavva karna safar roadways ki Buson mein.

सर्वहारा शेर

डरो ट्रेन से नहीं, डरो ट्रक से नहीं, डरो ब्लू लाइन से नहीं....2
उनमे तो फिर भी ब्रेक होता हैं...
डरो तो उस रिक्शे से जिसमे किसी का खून जलता हैं..

Sunday, 23 December 2007

इस दफ़ा जनाब बशीर बद्र से माफ़ी मांगते हुए

कोई पान भी न खिलाएगा, जो पडे़ मिलोगे उधार में
ये नई दुकां है खुली यहां, कभी कैश पैसे दिया करो

Thursday, 20 December 2007

बाग़ीचा-ए-अल्ताफ़

बाग़ीचा-ए-अल्ताफ़* में कुटिया मेरे आगे
धोता है हरेक वक़्त वो पजामा मेरे आगे

(बाग़ीचा-ए-अल्ताफ़: अल्ताफ़ भाई का कालाढूंगी स्थित आम का विख्यात बग़ीचा जहां अब आम नहीं उगते. उस बग़ीचे में अब शंकर की झोपड़ी है. शंकर कालाढूंगी का एक स्ट्रग्लर धोबी है. यह पूरी सूचना सत्य है. उपरिलिखित शेर इसी सूचना पर आधारित है.)

Wednesday, 19 December 2007

शेर

शेर सुनने मे मजा आता है /शेर कहने मे मजा आता है /
शेर सामने आये तो फिर दौड़ने मे मजा आता है //

Tuesday, 18 December 2007

मुकुल की भेजी शायरी

पहन मुद्रिका अंगुरी बांचत फिरत कबीर
यौं मूढन की गांठ हौ काहे हवत अधीर

- कुमार मुकुल


मांग के खाते थे रोटी और सोचते थे
जी रहे हैं लोग यूं भी कोटि-कोटि

- कुमार मुकुल

Monday, 17 December 2007

इंटर गफिल्ला द किल किल द पौं पौं


हरसिंह उर्फ़ हरदा की छोटी सी दुकान है नैनीताल की सब्जी-अंडा-मीट मार्केट में। वो कई सालों से हमें कई सारे शेर सुनाते रहे हैं लेकिन एक अदभुत शेर है जिसका मतलब और जुबां आज तक समझ में नहीं आये। आप भी ट्राई कीजिए ककड़ी की तरी का यह स्वाद:

इंटर गफिल्ला द किल किल द पौं पौं
नार द कमसिन, फिल्टर झां पौं
झंको रे नत्ता, नत्ता झंको
नत्ता झंको, झंको नत्ता

Thursday, 13 December 2007

सुनिये राग दरबारी से रामाधीन भीखमखेडवी का हाल हवाल


श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास राग दरबारी किसी परिचय का मुहताज नहीं है. उधर हमने टूटी हुई बिखरी हुई पर कई दिनों से एलान कर रखा है कि हम वहाँ राग दरबारी आपको सुनवाएँगे. इसे शुरू न कर पाने में दुविधा यही है कि इसके प्रोडक्शन की गुणवत्ता को लेकर अभी मैं आश्वस्त नहीं हूँ. अब, जब कि अशोक पांडे ने रामाधीन भीखमखेडवी को सस्ते शेर की महफिल में आमंत्रित कर ही लिया है, तो ये मौज़ूँ लगता है कि जैसा भी है इसे एक बानगी के तौर पर आपके सामने पेश करूँ. आपको कैसा लगा- राय भेजियेगा.
------------------
क़िस्सागो: मुनीश

Dur. 08 Min. 43 Sec.

रामाधीन भीखमखेडवी उर्फ़ कल्लोपरी का सबसे पुराना आसिक


'राग दरबारी' जिसने नहीं जानी, वो इसे न देखे

श्रीलाल शुक्ल जी के कालजयी उपन्यास 'राग दरबारी' के एक अविस्मरणीय चरित्र रामाधीन भीखमखेडवी की आत्मा ने कल शहर हल्द्वानी के डहरिया गांव में अपना शेर पूरा किया (परम आदरणीय श्रीलाल शुक्ल जी माफ़ कर देंगे इस शरारत पर)। प्रस्तुत है रामाधीन भीखमखेडवी का चौपाया:

रात को रोशन तू कर और चन्द्रमा सियाह बना
रात होते ही वो दरवाज़ों को सारे भेड जाती हैं
मुझे भी कभू नसीब हो वस्ल महज़बीनों का
कलूटी लडकियां हर शाम मुझको छेड जाती हैं

Tuesday, 11 December 2007

मोहल्ले में कल्लोपरी का आगमन

धोखा मिला जब मोब्ब्त-ओ-बफा में, ज़िन्दगी में उदासी छा गई
सल्फ़ास का पैकेट लाया तो था, मोहल्ले में मगर कल्लोपरी आ गई

हिसाब बरोब्बर

१२ नवम्बर को विमल वर्मा जी ने एस एम एस वाली एक अदभुत कविता लगाई थी। आज मुझे एक सज्जन ने उसी का लम्बा वर्ज़न भेज डाला। कुछ जादै सस्ता हैगा:


मैं कल रास्ते में था

कि मेरी चप्पल टूट गई

अब चप्पल तो मोची सीता है

सीता तो दर्ज़ी भी है

दर्ज़ी तो कपडे सीता है

कपडे तो रंगीन होते हैं

रंगीन तो मग भी होता है

मग तो बाथरूम में होता है

बाथरूम में नल भी होता है

नल तो लोहे का होता है

लोहे की तो इस्तरी होती है

इस्तरी तो गरम होती है

गरम तो कस्टर्ड भी होता है

कस्टर्ड तो पीला होता है

पीला तो चूज़ा भी होता है

चूज़ा तो अण्डे से निकलता है

अन्डा तो सफ़ेद होता है

सफ़ेद तो दूध भी होता है

दूध तो भैंस देती है

भैंस तो काली होती है

काला तो बंगाली भी होता है

बंगाली तो पान खाता है

पान तो लाल होता है

लाल तो गुलाब भी होता है

गुलाब में तो कांटे होते हैं

कांटे तो मछ्ली में भई होते हैं

मछ्ली तो अच्छी होती है

अच्छा तो बन्दर भी होता है

बन्दर तो बन्दर होता है

पढ्ने वाले भी तो बन्दर होते हैं

जो पढ के अपना टाइम बरबाद करते हैं

...

खैर ऊपर वाले ने आप को भेजा तो भेजा

पर भेजा तो ऐसा भेजा

कि
भेजे में भेजा नहीं भेजा
...

ये मुझे किसी और ने भेजा

इस लिए मैंने आपको भेजा ।

आप को बुरा लगा?

तो आप किसी और को भेज दो

...

हिसाब

बरोब्बर

(अ) धार्मिक शेर : खुदा ही खुदा



इधर खुदा है, उधर खुदा है, जिधर भी देखो वहीं खुदा है
इधर उधर बस खुदा खुदा है, जिधर भी यारो नहीं खुदा है ...

वहाँ कल खुदेगा।

Monday, 10 December 2007

पाठ कुपाठ : ठेठ ब्रुक हिल का ठाठ

(कबाड़खाना के पन्नों पर कई दफा ब्रुक हिल का ज़िक्र आया है । नैनीताल में यह एक आम छात्रावास देश-दुनिया के बाक़ी छात्रावासों की तरह ही था । यहाँ पर भी और जगहों की तरह कुछ न कुछ रोज नया रचा जाता रहा-कुछ ठेठ कुछ भदेस । उसी में से कुछ माल कम्पनी के प्रचार के वास्ते और आम जनता के फायदे के बाबत यहाँ डिस्पले किया जा रहा है। माल नंबर एक का उत्पादंकर्ता आजकल चेन्नई में साइंस पढा रिया है और माल नंबर दो वाला इस नाचीज़ को ही मान लें ।)

एक नंबर(का माल)-

रात के अँधेरे में मेरे सिर पर बजती है ,
तीन सूत की सरिया तडा ताड़ -तडा ताड़ ,तडा ताड़ ,तडा ताड़, तडा ताड़ .....

दो नंबर (का माल)-

तेरे हुस्न की मिसाइल मेरे दिल के पता नहीं किस स्तान पर गिरी है,
पर जे तो जुलुम है तू अंतर्राष्ट्रीय संस्था की तरह चुप-सी काय कू खड़ी है।

मोब्बत पे घटिया शेर

उनका नाम लिख के जो, धूप में रख दूं तो
उन्हें पसीना आ जाये, ऎसी मेरी मोब्बत है

लोग कहते हैं: "पी के आया है"

हर तरफ खामोशी का साया है
जिस को देखो वही पराया है
गिर पड़ा हूँ मुहब्बत की मार से
लोग कहते हैं: "पी के आया है"

Sunday, 9 December 2007

शमशान में पिया करूंगा

कफ़न के भीतर मेरे इक बोतल छुपा देना, शमशान में पिया करूंगा
जब हिसाब मांगेंगे भगवान् जी, उन्हें भी थोड़ी दिया करूंगा

आओ कहीं अद्धा पियें

कुछ भी बचा न कहने को, हर बात हो गयी,
आओ कहीं अद्धा पियें, अब रात हो गयी

Friday, 7 December 2007

अश्लील शेर

वो आगे आगे वस्ल का वादा किये हुए
हम पीछे पीछे सिर पे चारपाई लिए हुए

(मेरे मित्र सी एस तिवारी का सुनाया शेर)

Thursday, 6 December 2007

BHAVUKTA KE PAL

FALAK PE SITARON KO NEEND AA RAHI HAI
FALAK PE SITARON KO NEEND AA RAHI HAI,
TERI AISI KI TAISI.....TU AB AA RAHI HAI!!!

Sunday, 2 December 2007

इस बार हैरी बैलाफोंते के बहाने अंग्रेजी के सस्ते शेर

'किंग ऑफ़ कैलिप्सो' के नाम से मशहूर उस्ताद हैरी बैलाफोंते जमैका के सफलतम गायकों में थे। मानवतावादी सरोकारों और नागरिक अधिकारों की पैरोकारी करते रहे और हाल के दिनों में (फिलहाल वे अस्सी के हैं) अमरीकी झाड़ जॉर्ज बुश के सबसे मुखर विरोधियों में शुमार होते हैं। ' Man Smart, Woman Smarter' उनकी लोकप्रिय रचना है। फिलहाल अंग्रेजी बोल लगा रह हूँ। समय मिलते ही हिन्दी अनुवाद लगाने की कोशिश करूंगा.



I say let us put man and a woman together
To find out which one is smarter
Some say man but I say no
The woman got the man de day should know

And not me but the people they say
That de man are leading de women astray
But I say, that the women of today
Smarter than the man in every way

That’s right de woman is uh smarter
That’s right de woman is uh smarter
That’s right de woman is uh smarter, that’s right, that’s right

Ever since the world began
Woman was always teaching man
And I you listen to my bid attentively
I goin’ tell you how she smarter than me

Samson was the strongest man long ago
No one could a beat him, as we all know
Until he clash with Deliah on top of the bed
She told them all the strength was in the hair of his head

You meet a girl at a pretty dance
Thinking that you would stand a chance
Take her home, thinking she’s alone
Open de door you find her husband home

I was treating a girl independently
She was making baby for me
When de baby born and I went to see
Eyes was blue it was not by me

Garden of Eden was very nice
Adam never work in Paradise
Eve meet snake, Paradise gone
She make Adam work from that day on

Methuselah spent all his life in tears
Lived without a woman for 900 years
One day he decided to have some fun
The poor man never lived to see 900 and one

Saturday, 1 December 2007

bhaaiyon.........

ZAMANE SE NA DAB GALIB TU USKE LIYE HO JA HAUVVA,

KHEESE KO KAR ZARA DHEELA, HALAK SE UTAR LE PAUVVA.

Friday, 30 November 2007

OLD MONK PREMIYO KE LIYE

BUJHAANA PYAAS KA SEEKHA HUMNE SEHRA KE OONT SE,
AUR GAM KO GALAT KARTE GAYE HUM RUM KE GHOONT SE.

Tuesday, 27 November 2007

फ्रस्ट्रेशन

जहर खाया अजीज हो।
पर जहर भी दवा हुयी॥
पंखा दहेज़ मी मिला।
तो बीबी हवा हुयी।

thumri

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Monday, 26 November 2007

अकल से मोटा

अकल से मोटा हमारा चाम होना चाहिऐ /
हो भले थू- थू मगर कुछ नाम होना चाहिऐ //
प्यार करने के लिए काफी कलेजा ही नही /
बाप से बेटा तनिक बदनाम होना चाहिऐ //

Friday, 23 November 2007

इक़्बाल और माजिद लाहौरी की रूह से माफ़ी के साथ


कमज़ोर मक़ाबल हो तो फ़ौलाद हे जरनील
अमरीकी हुं सरकार तो औलाद हे जरनील
क़मारी व ग़फ़ारी व क़दोसी व जबरोत
इस क़सम की हर क़ैद से आज़ाद हे जरनील
जरनील की आंखो में खटकती हे अदालत
हुं जज जो आज़ाद तो बरबाद हे जरनील
हर वक़्त वा पहने हे सदारत में भी वर्दी
बीवी भी उतरवाये तो नाशाद हे जरनील
दरानी व अफ़गन की क़सोरी व शजाएत
शीतान के इन, उन चीलयां का उस्ताद हे जरनील

Thursday, 22 November 2007

`बन्दर सभा´ के कुछ अशआर

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (1850-1885)संभवत: हिन्दी के पहले पैरोडीकार हैं।उन्होंने नवाब वाजिद अली शाह `अख्तर` के नाटक `इन्दर सभा´ की पैरोडी `बन्दर सभा´ के नाम से लिखी थी ।इसी का एक टुकड़ा पेश है-

(आना शुतुरमुर्ग परी का बीच सभा के )

आज महफिल में शुतुरमुर्ग परी आती है।
गोया महमिल से व लैली उतरी आती है।

तैल ओ पानी से पट्टी है संवारी सिर पर
मुंह पै मांझा दिए जल्लादो जरी आती है।

झूठे पठ्ठे की है मूबाफ पड़ी चोटी में
देखते ही जिसे आंखों में तरी आती है।

पान भी खाया है मिस्सी भी जमाई हैगी
हाथ में पायंचा लेकर निखरी आती है।

मार सकते हैं परिन्दे भी नही पर जिस तक
चिड़या वाले के यहां अब व परी आती है।

Wednesday, 21 November 2007

हकिकत


होठ तेरे जैसे गुलाब,
मदिरा से भरा जाम था।
सुन्घा वो गुलाब तौबा तौबा
वो तो क्लोरोफ़ार्म था...

फ़्रस्टु शेर..

डाली डाली डाली १ फ़ूल पर मैने नजर डाली
हाय रे मेरी किस्मत, जिस फ़ूल पर मैने नजर डाली
उसे पहले ही काट लिया माली..

पी के का जीवन और सारे सस्ते शायरों को खुला निमंत्रण

मय्यत में गया पी के, शादी में गया पी के
दिल्ली गया तो पी के, घर लौट पहुँचा पी के
हुआ पोपुलर वो पी के, था नाम उस का पी के
पी के की वजह लोगो, यारों की बढ़ी जी के

उस पी के नाम शख्स का कल पढ़ के फ़ातेहा
हम घर की रहगुज़र थे कि घटा एक सानेहा
इक भूत मिला हाथ में पव्वा लिए कहता
कुछ भात दो और कुछ दो मुझे छोले कढ़ी पी के

(समस्त सस्ते शायर भाइयों से अपील है कि इन दो छंदों में मीटर की कमियाँ दूर करें और अपनी तरफ से कम-अज-कम एक एक छंद अवश्य जोडें। पी के भाई के जीवन की कहीं तो कोई कथा रेकार्ड हो जावे। जय बोर्ची! जय सस्तापन!!)

Tuesday, 20 November 2007

सार्वजनिक टायलेट शेर

फ़ुल है गुलाब का चमेली का मत समझना।
आशिक हु आपका सहेली का मत समझना॥

लाईनमारु शेर

तेरे नयनो कि ब्यूटी ने मुझे एट्रक्ट किया।
औरो को रिजेक्ट किया, बस तुझे ही सेलेक्ट किया॥
तुझसे रिक्वेस्ट है कि रिफ़्युज ना करना।
मेरे मोहब्बत के बल्ब को फ़्युज ना करना..

Monday, 19 November 2007

माफ़ी ग़ालिब चचा

हाँ जेब में कौड़ी नहीं, खीसे में तो रम है
करने दे मुझे पीना-ओ-खाना परे जा के

Sunday, 18 November 2007

लावनी के रंग


लोक गायकी में लावनी अब एक मृतप्राय कला है. जौनपुर के जिन लावनी गायकों से हम परिचित है‍ वे सार्थक आ‍दोलन से जुड़े गायक थे. अध्येताओं ने इस कला पर अध्ययन के दौरान पाया है कि यह लोकप्रिय और ऊर्जा से भरपूर कला थी. इसमें सक्रिय घरानों ने ख़ूब नाम कमाया और जनसंवेदना को हरा-भरा बनाए रखा. तुर्रा और कलगी से अलग किये जानेवाले दो घरानों के बीच चलने वाली नोकझोंक आज भी उन्हें याद है जो उस दौर की लावनी के गवाह हैं. बात को कहने की कलात्मक मजबूरियां कभी उनकी राह में रोडा नहीं बनीं. उन्होंने मौक़ा-ब-मौक़ा अपने ख़ालिस अंदाज़ का सहारा लिया लेकिन कभी लोगों की नज़र में हेय नहीं बने.

बादल मियां तुर्रावाले ने जब पूछा-
यह किधर से आई घटा किधर से पानी,
दो जवाब इसका आप जो हो गुर ज्ञानी.

तो बाबा बनारसी कलगीवाले ने जवाब दिया-
पढ़-पढ के फ़ाज़िल हुए, बात नहीं जानी,
बादल की फट गई गांड़ बरसता पानी.

TRUCK PE LIKHA EK SHER

HUMKO TO DARU NE MARA CIGARETTE ME KAHAN DUM THA,

AJI KISTI VAHIN DOOBI APNI KE PANI JAHAN PE KAM THA.

Thursday, 15 November 2007

ARUN MADHUMAY DESH:2

KOI SHAIDAI WHISKEY KA ,TO KOI RUM PE FIDA HAI,

MANZIL HAI SABKI EK YAARA,RASTA MAGAR JUDA HAI.

Tuesday, 13 November 2007

अकबर चचा के अशआर : २


नहीं साइंस वाकिफ कारे-ए-दीं * से
खुदा बाहर है हद्द-ए-दूरबीं ** से
मशीनों ने किया नेकों को रुखसत
कबूतर उड़ गए इंजन की पीं से
बिसात-ए-हलक़-ए-म्युनिसिपल *** देख
तुझे क्या काम है जापान-ओ-चीं से

-अकबर इलाहाबादी

*मजहबी काम
**दूरबीन की सीमा
***नगरपालिका के अन्दर आने वाला इलाका

अकबर चचा के अशआर : एक


हम क्या कहें अहबाब क्या कार-ए-नुमायाँ कर गए
बी ए हुए, नौकर हुए, पेंशन मिली, फिर मर गए

बताऊँ आपसे, मरने के बाद क्या होगा
पुलाओ खाएँगे अहबाब, फ़ातेहा होगा

क्या कहूं इसको मैं बदबख्ती-ए-नेशन के सिवा
उसको आता नहीं अब कुछ इमीटेशन के सिवा


-अकबर इलाहाबादी

Monday, 12 November 2007

TRIBUTE TO PAVVA

ADDHEY SE NAHI PARHEZ MUJKO,
ADHDHEY SE NAHI PARHEZ MUJHKO, PAR PAVVA ZARA TRENDY HAI,

KHEESAY ME SAMA JAYE HAI , YE ITEM BADA HANDY HAI.

अंडा तो सफ़ेद होता है !!!!


अंडा तो सफ़ेद होता है !

सफ़ेद तो दूध भी होता है !!

दूध तो भैंस देती है !

भैंस तो काली होती है !

काला तो आदमी भी होता है !

आदमी तो पान खाता है !!

पान तो लाल होता है !

लाल तो गुलाब भी होता है !!

गुलाब में कांटे होते हैं !

कांटे तो मछली में भी होते हैं !!

मछली तो अच्छी होती है !

अच्छा तो इंसान भी होता है !!

इंसान तो लम्बा होता है !

लम्बा तो ये मैसेज भी है !!

मुझे तो दिमाग खाना था !

खा लिया !!

( ये एक sms msg है )

Thursday, 8 November 2007

स्वर्गीय अवधेश का एक शेर और संक्षिप्त परिचय 'टंटा' समिति का

१९९० में मैंने पहली बार देहरादून के संस्कृति कर्मियों के बेहद ऊर्जावान केंद्र 'टिपटौप' रेस्त्रां के दर्शन किये थे। पता लगा था कि मशहूर कवि-कलाकार अवधेश (जिन्हें अज्ञेय जी ने अपनी अन्तिम सप्तक श्रृंखला में जगह दी थी) और गजलकार हरजीत सिंह भी यहीं से ऑपरेट करते हैं। अन्य साथियों के साथ ये दोनों पर अपने तमाम साहित्यिक ऑपरेशन 'टंटा' समिति के नाम से चलाया करते थे। आमतौर पर टंटों से दूर रहने वाली इस संस्था का यह abrreviated नाम था। TANTA का पूरा नाम था : Total Awareness for Neo Toxic Adventures. ज़रा देखिए यह समिति अपने हिन्दी अनुवाद में किस कदर आकर्षक लगती थी : 'पूर्ण टुन्नावस्था का नव नशीलित रोमांच'।

संस्था के अघोषित मुखिया स्वर्गीय अवधेश का एक सस्ता खुसरोवादी शेर मंत्रवाक्य की हैसियत रखता था। पेश है:

गोरी सोवत सेज पे, सो मुँह पर डारे खेस
चल खुसरो घर आपने साँझ भई अवधेस

Wednesday, 7 November 2007

दर्द भोगपुरी एक दफा फिर बज़रिये नवीन नैथानी

सूखे गले के साथ भी वाइज़ के पास थे
अपनी क़सम! ख्वाब में क्या क्या नहीं किया

* सुधी पाठकों को याद दिलाता चलूँ कि नवीन नैथानी उर्फ़ दर्द भोगपुरी मशहूर कहानीकार हैं। कुछ समय पहले मैंने उनका एक शेर यहाँ लगाया था जो कतिपय कारणों से तब हटा दिया गया था। उसी शेर को दुबारा यहाँ लगाते हुए मुझे देहरादून के दो शानदार शायर याद आ रहे हैं : स्वर्गीय अवधेश और स्वर्गीय हरजीत की सदारत में चलने वाली देहरादून की टंटा समिति के प्रमुख स्तंभ थे दर्द साहब। दर्द साहब के ये तमाम शेर उसी दौर के हैं। अब न हरजीत भाई हैं न अवधेश भाई न देहरादून। खुद नवीन भाई भी डाक पत्थर में जमे हैं आजकल। टंटा समिति पर एक पोस्ट जल्द आयेगी। फिलहाल जादै इमोस्नल न होता हुआ मैं दर्द साहब के स्थाई भाव को व्यक्त करता उन्ही का शेर लगाता हूँ :

शराब-ओ-जाम के इस दर्जा वो करीब हुए
जो दर्द भोगपुरी थे गटर नसीब हुए

Tuesday, 6 November 2007

दर्द भोगपुरी उर्फ़ नवीन नैथानी का ताज़ा शेर

मैं तमाम पव्वे उठा उठा के, गरीब लोगों में बाँट दूं।
बस एक बार वो मैकदे का निजाम दे मेरे हाथ में।

(नवीन भाई ने ये शेर आज ही सुबह मुझे एस एम् एस पर इसे भेजा है)

Songs पैरोडी


फ़िल्म: एक फूल दो माली का गाना सुनिये.
आवाज़े: रफ़ी-लता
गीत-आनंद बक्षी
संगीत-लक्ष्मी-प्यारे

Monday, 5 November 2007

पप्पुन का सेर

साहेबान न तो हिन्दी आती है न उर्दू। फारसी जैसी महान भाषा की क्या कहूं। मगर सायरी में बहुत लुफ्त आता है कम्बखत। बीस साल पहले मेरे प्यारे भतीजे रफ़त आलम उर्फ पप्पुन ने एक महान फुस्कारा शेर सुनाया था। पप्पुन के हिसाब से ‘बैतूलखला’ का अर्थ शौचालय होता है और ‘री’ माने वायु विसर्जन से उपजी ध्वनि। हो सकता है यहां स्पैलिंग और अर्थ वगैरा की मिस्टेकें हों मगर असली बात इन लफ्जों से अलहदा है।

बाकी जिस तरह का कोल्ड शोल्डर भाई लोग इस कोटि के शेरों को दे रहे हैं बन्दे के दिल में तमाम तरह के गलत सलत खयालातों का उठना लाज़िमी है। हो सकता है यह आखिरी फुस्कारा शेर हो यहां। वैसे इस तरह के शेर कभी खत्म नहीं हो सकते क्योंकि वैज्ञानिक शोध बतलाते हैं कि एक मनुष्य (यदि जीवित हो तो) दिन में औसतन चौदह बार नैसर्गिक वायु विसर्जन करता है। मरने के बाद भी आदमी की देह से एक बार वायु बाहर आती है। यह प्रक्रिया प्रेम से भी ज्यादा नैसर्गिक है और यकीन मानिए प्रेम से ज्यादा सुकूनदेह भी। मैं तो सीरियसली इस कोटि के काव्य हेतु एक नया ब्लॉग चालू करने की सोच रहा हूं। क्या कहते हो इरफान बाबू। फिलहाल ये रिया सेर :


बैतूलखला से री की तरन्नुम सी आ रही
शायद कोई हसीना पेचिश में मुब्तिला है

(एक झोंक में ब्लॉग भी बन सा गया, www.havahavai.blogspot.com पे भी आयें साहेबान.)

Sunday, 4 November 2007

असफल प्रेमी का एक और आयाम उर्फ़ मानव इतिहास की पहली सूफी पाद





उनकी याद में आई पाद
बाक़ी बातें सुबह के बाद

इक दिन


यारो इक दिन मौत जरूर ।
फिर क्यौं इतने गाफिल होकर बने नशे मे चूर ।
यही चुड़ैलें तुम्हे खायेंगी जिन्हें समझते हूर ।
माया मोह जाल की फांसी इससे भागो दूर ।
जान बूझकर धोखा खाना है यह कौन शऊर ।

Thursday, 1 November 2007

दो शेरों को अलग करने के लिये


चटनी के सैम बुधराम
विमल भाई ने आज ये दो गाने जारी कर के कमाल कर दिया. मेरे दिमाग़ में इस शाम बस यही बज रहे हैं.
मैंने सोचा कि ये दोनों गानें आप तक कम समय में और लड़ते हुए फट पहुंच जाएं.
तो लीजिये भाई रोहित की कारीगरी और मेरी बददिमाग़ी का लुत्फ़ उठाइये.
ये उलझे हुए शेर ख़ास तौर पर उन लोगों के लिये जिन्हें ठुमरी पर ये सुलझे गाने सुनने की तौफ़ीक़ न हुई.
सुलझाने के लिये यहां जाएं.