कई बार खुदा से बड़ी मासूम सी गुजारिशें की जाती हैं और ये गुजारिशें होती भी ऐसी हैं कि वो भी बिचारा मुश्किल में पड़ जाता है कि अब क्या किया जाए
या खुदा निगाहे नाज़ पर लायसेन्स क्यों नहीं
ये भी तो कत्ल करती हैं बन्दूक की तरह
महंगाई के दौर में एक राहत की सांस
कई बार खुदा से बड़ी मासूम सी गुजारिशें की जाती हैं और ये गुजारिशें होती भी ऐसी हैं कि वो भी बिचारा मुश्किल में पड़ जाता है कि अब क्या किया जाए
या खुदा निगाहे नाज़ पर लायसेन्स क्यों नहीं
ये भी तो कत्ल करती हैं बन्दूक की तरह
मित्रों आपको कोई जवानी की प्रेमिका कभी अधेड़ावस्था में मिली है । हमें मिली तो श्रीमती सरोज व्यास का शेर पेल गई । क्यों, दरअस्ल में वे तो वैसी की वैसी ही नजर आ रहीं थीं ( जय हो ब्यूटी पार्लर) जैसी हमें जवानी में मिलीं थीं मगर हम तो उस अवस्था का अंश भी नहीं बचे थे । और इसीलिये वो शेर कह गईं कि
ये है मौसमों का कोई असर, या ग़ज़ल का कोई निज़ाम है
मैं रही रदीफ़ सी ज्यूं की त्यूं, तुम्हीं काफि़ये से बदल गए
बाबा नज़ीर अकबराबादी की ज़मीन पर शायर-ए-वतन जोश मलीहाबादी साहब ने एक कविता लिखी थी: "धन राजा का जो पाए है लौंडा फ़क़ीर का". बेदख़ल मनीषा पांडे को नज़्र है उसी से एक टुकड़ा और साथ में ये दोस्ताना सलाह भी कि 'डोन्ट यू वरी'.
असली अमीर हूं ये दिखाने के वास्ते
पुरखों की गन्दगी को छिपाने के वास्ते
जो बू बसी है उसको दबाने के वास्ते
माता-पिता का मैल छिपाने के वास्ते
दो दो पहर नहाए है लौंडा फ़क़ीर का
धन राजा का जो पाए है लौंडा फ़क़ीर का
क्या क्या ठसक दिखाए है लौंडा फ़क़ीर का
चढ़ा दो झाड़ पर उसको चने के और फिर पूछो
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प्रसिद्ध हास्य कवि स्व काका हाथरसी की ये ग़ज़ल सुनें वैसे तो इसमें भी बच्चे हैं पर वे मेहबूबा के न होकर अपनी ही सगी वाली पत्नी के हैं
हमीं से पूछती हैं भाव चीनी और चावल के
पता उनको नहीं कुछ आठ बच्चों की मदर होकर
घटापा चल रहा अपना, मुटापा बढ़ रहा उनका
कुचल देंगें मेरी सैकिल, किसी दिन ट्रेक्टर होकर
मुहब्बत भी बड़ी अजीब चीज़ होती है लोग कहते हैं कि मैं उससे मुहब्बत करता था पर कह नहीं पाया यो शर्म में ही रह गया । मगर उम्र शर्म थोड़े ही देखती है आपकी शर्म ही शर्म में उसके बच्चे आकर आपको मामा भी कह जाते हैं । वरिष्ठ कवि आदरणीय प्रदीप जी चौबे की ये ग़ज़ल तो ये ही कहती है
ग़रीबों का बहुत कम हो गया है वेट क्या कीजे
अमीरों का निकलता आ रहा है पेट क्या कीजे
हमें जिससे मुहब्बत थी उसे अब चार बच्चे हैं
तकल्लुफ़ में बिरादर हो गए हम लेट क्या कीजे
अब जब सभी लोग दूसरों की ही पेल रहे हैं तो मैं क्यों पीछे रहूं । पर आज जो गज़ल़ मैं दे रहा हूं ये जनाब अल्हड़ बीकानेरी जी की एक मज़ेदार ग़ज़ल है जिसका हर शेर आनंद देता है ।
लफ़्ज़ तोड़े मरोड़े ग़ज़ल हो गई
सर रदीफ़ों के फोड़े ग़ज़ल हो गई
लीद करके अदीबों की महफि़ल में कल
हिनहिनाए जो घोड़े ग़ज़ल हो गई
ले के माइक गधा इक लगा रेंकने
हाथ पब्लिक ने जोड़े गज़ल हो गई
पंख चींटी के निकले बनी शाइरा
आन लिपटे मकोड़े ग़ज़ल हो गई
अपने शेर पेलने का एक अलग ही आंनद होता है और उस आनंद की ही खातिर हमने सस्ता शेर ज्वाइन ( अवैतनिक) करने के बाद से कोई भी शेर किसी दूसरे का नहीं पेला । अपने ही माल से काम चला रहे हैं बल्कि रोज ही खुद ही लिख रहे हैं । और लिख लिख कर ही पेल रहे हैं ।
चलिये एक और याद का शेर प्रस्तुत है
तेरे भाई वो नाटे और काले याद आते हैं
जो होते होते रे गय वो ही 'साले' याद आते हैं
ग़ज़ब मारा था उस जालिम ने यूं के आज तक हमको
वो दिन जो हस्पतालों में निकाले याद आते हैं